श्रीराधा-माधुरी · पद 16
छबीली छवि, अलि छलियाहुँ छली।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhabīlī chhavi, ali chhaliyāhuṁ chhalī
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1छबीली छवि, अलि छलियाहुँ छली।
2यह छलिया रह छलत अलिन सब, छल करि कुंज-गली।
3पायो फल भल, निज छल-बल को, अति अति बुरी अली।
4अब तो विलपत हा राधे कहि, हा वृषभानु-लली।
5भूली दृगन विलोकनि मुसकनि, भूली सुधि मुरली।
6कब “कृपालु” सरिता चंचलता, जलनिधि माहिं चली॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि कहती है कि किशोरी जी की छवि माधुरी ने विशवविमोहन श्यामसुन्दर को भी बरबस अपने अधीन कर लिया है। बड़ा अच्छा हुआ, यह छलिया श्यामसुन्दर अपने मधुर-कटाक्षादि के द्वारा निकृंज-वीथियों में समस्त ब्रजांगनाओं को पागल बनाता था। अब उसने अपने छल-बल का भली भांति फल पा लिया। ठीक ही है, किसी भी बात की अतिशयता बुरी ही होती है। अरी सखि! अब तो वह छलिया 'हा वुषभानुनन्दिनी'! 'हा राधे'! कह-कह कर विलाप किया करता है। अब तो आँखों का कटाक्ष एवं मुस्कराना तथा मुरली की मधुर तान सभी भूल चुका है। 'कृपालु' कहते हैं कि अरी! समुद्र सदृश वृषभानुनन्दिनी में एकत्व को प्राप्त होने के पश्चात् श्यामसुन्दर रूपी नदी की चंचलता किस प्रकार रह पकती है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 446