श्रीराधा-माधुरी · पद 15
कुँवरि लखि लाजत सखि! श्रृंगार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: kuṁvari lakhi, lājata sakhi! shṛiṅgāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1कुँवरि लखि लाजत सखि! श्रृंगार।
2कहा कहूँ छवि कनक मुकुट पर, लर मोतिन बलिहार।
3सिर चूनरि नासा नथ बेसर, नयन सहज कजरार।
4सेंदुर भाल पाणि मेहँदी पग, जावक सुघर सँवार।
5कटि किंकिनि पग पायल अँगुरिन, बिछुवनि छवि छबिदार।
6को “कृपालु” कह चितवनि छवि कछु, जानत नंदकुमार॥
हिन्दी भावार्थ
श्री किशोरी जी की अनुपम रूप माधुरी को देखकर मूर्तिमान शृंगार भी लज्जित होता है। किशोरी जी के दिव्य स्वर्ण के मुकुट पर मोतियों की लड़ियों का शृंगार अनिर्वचनीय है। सिर पर चुनरी, नासिका में नथ बेसर, एवं स्वाभाविक कजरारे नैन अत्यन्त ही मनोहारी हैं। ललाट में सिन्दूर, हाथ में मेंहदी एवं चरण में मिहावर की लाली नितान्त सुन्दर है। कमर में करधनी, चरण में पायल एवं अंगुलियों में बिछुओं की शोभा क्या ही शोभनीय है। 'कृपालु' कहते हैं कि किशोरी जी की दिव्य प्रेममयी चितवन तो सर्वथा ही अनुपम है जिसके माधुर्य को श्यामसुन्दर भी कुछ-कुछ ही जानते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 445-446