श्रीराधा-माधुरी · पद 17
यमुन तट ठाढ़ीं भानु दुलार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: yamuna taṭa ṭhād̤hīṁ bhānudulāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1यमुन तट ठाढ़ीं भानु दुलार।
2छवि सोरह श्रृंगार लजावति, मूर्तिमान श्रृंगार।
3अति भोरी मुसकान मधुर मृदु, रसिकन की रिझवार।
4रति रस-सरस रसीले नैनन, देखति यमुना-धार।
5प्रत्यंगनि उत्तुंग तरंगनि, कालिंदिहुँ बलिहार।
6कह कर जोरि “कृपालु” सखिन सँग, जल बिच करिय विहार॥
हिन्दी भावार्थ
वृषभानुनन्दिनी राधिका यमुना के किनारे खड़ी हैं उनके सोलहों शृंगारयुक्त सौन्दर्य को देखकर साक्षात् शृंगार भी लज्जित होता है। उनकी अत्यन्त भोली एवं मधुर मुस्कान रसिकों को आनन्द देने वाली है। वे सरस प्रेमयुक्त आँखों से यमुना की धारा को देख रही हैं। उनको देखकर साक्षात् यमुना ठ ऊँची-ऊँची तरंगों को उछालती हुई मानो अंग-अंग से बलिहार जा रही हैं। 'कृपालु'किशोरी जी से हाथ जोड़कर कहते हैं कि सखियाँ आपकी प्रतीक्षा कर रही हैं, जल विहार के लिये पधारिये।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 446-447