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RADHEY RADHEY

श्रीराधा-माधुरी · पद 18

जयति जय, जयति जयति राधे।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: jayati jaya, jayati jayati rādhe

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1जयति जय, जयति जयति राधे।

2जग आराधे जेहि हरि, सोइ हरि, राधे आराधे।

3गावत राधे नाम मुरलि महँ, रूप-ध्यान साधे।

4खोजत गहवर गलिन विरह महँ, कल नहिं पल आधे।

5"रा"कहि गिरत धरणि ह्वै मुर्छित, मुख कहि सक ना"धे"।

6मोहिं “कृपालु” सखि मानु आपनी, प्रेम-सुधा गाधे॥

हिन्दी भावार्थ

हे वृषभानुनन्दिनी राधे! तुम्हारी जय हो! तुम्हारी जय हो! तुम्हारी जय हो! सम्पूर्ण विश्व जिन भगवान् कृष्ण की उपासना करता है, वे श्रीकृष्ण भी किशोरी जी की उपासना करते हैं। रूपध्यान करते हुए मुरली में 'राधे 'नाम का संकीर्तन करते हैं। किशोरी जी के वियोग में गहवर-वन की गलियों में विलाप करते हैं। उनके बिना आधे क्षण को भी चैन से नहीं रह सकते। विरह की अवस्था इतनी हो जाती है कि 'रा कहकर मूछिंत होकर पृथ्वी पर गिर पड़ते हैं, 'धे "का उच्चारण नहीं कर पाते। 'कृपालु' कहते हैं-''हे अनन्त प्रेमामृत की खानि वृषभानुजे! मुझे अपनी सखी मानकर कृतार्थ करो।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 447-448