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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 50

हमारो बाँको सुंदर श्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro bāṁko sundara shyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारो बाँको सुंदर श्याम।

2बाँकी मोर मुकुट की लटकनि, बाँकी लट अभिराम।

3बाँकी मटक भृकुटि अति बाँकी, बेसर नासा ठाम।

4बाँके नैन सैन अति बाँके, बाँके पट उरधाम।

5मधुर मधुर मृदु मुसकनि बाँकी, बाँकी ग्रीव ललाम।

6बाँको कटि तट नूपुर बाँको, बाँको वाको पाम।

7सब “कृपालु” बाँको अति बाँको, बाँको वाको काम॥

हिन्दी भावार्थ

हमारे श्यामसुन्दर अत्यन्त टेढ़े हैं। उनकी मोर मुकुट की लटक रेढ़ी है एवं उनकी घुँघराली अलकें भी टेढ़ी हैं। उनकी भौंहों की मटक भी टेढ़ी है एवं नासिका की बेसर तो अत्यन्त ही टेढ़ी है। उनके नैन एवं सैन अत्यन्त ही टेढ़े हैं। उनके गले में लटकता हुआ पीताम्बर भी टेढ़ा है। उनकी अत्यन्त मीठी मन्द मुस्कान एवं उनकी गर्दन भी टेढ़ी है। उनका करि भाग भी टेढ़ा है एवं उनके नूपुर तथा पैर भी रेढ़े हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि उनके समस्त टेढ़ेपन में अत्यन्त सौन्दर्य-माधुर्य है। कहाँ तक कहें उनके सब काम ही टेढ़े हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 429-430