श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 51
हमारो रसिक रँगीलो श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro rasika raṁgīlo shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो रसिक रँगीलो श्याम।
2इंद्रनीलमणि-नील कलेवर, लखि लाजत शत काम।
3छलकत प्रेमसुधारस चितवनि, मृदु मुसकनि अभिराम।
4मधुर मधुर धुनि वेनु बजावत, मनभावत ब्रजभाम।
5कबहुँ सखन सँग कबहुँ सखिन सँग, विहरत आठों याम।
6लखत “कृपालु” शंभु शुक झाँकी, श्री वृंदावन धाम॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे श्यामसुन्दर रसिकों के सिरमौर हैं। इन्द्र नीलमणि के समान उनके नीले शरीर को देखकर सैकड़ों कामदेव लज्जित हो जाते हैं। इनकी चितवन में प्रेम का अमृत छलक रहा है एवं उनकी मधुर मुस्कान अत्यन्त ही मनोरम है। वे मधुर-मधुर मुरली बजाते हुए ब्रजांगनाओं के मन को मोहित कर रहे हैं। वे कभी तो सखाओं के साथ, कभी सखियों के साथ दिन-रात विहार करते हैं 'कृपालु' कहते हैं कि भगवान् शंकर शुकदेव परमहँस इस बाँकी झाँकी को वृन्दावन में देखते रहते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 430