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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 49

हमारो प्रियतम नंदकिशोर।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro priyatama nandakishora

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारो प्रियतम नंदकिशोर।

2नील जलद रुचि-रुचिर कलेवर, रसिकन को सिरमोर।

3मनमाने अलसाने नैना, श्रीमुख चंद्र चकोर।

4अद्भुत रूप-विलास-विलोकनि, परमहंस चितचोर।

5ब्रजरस ब्रज वीथिन बरसावत, होत साँझ ते भोर।

6हम “कृपालु” नित पियत प्रेम रस, गौर-श्याम-रस घोर॥

हिन्दी भावार्थ

हमारे प्रियतम नन्द के लाल हैं, जिनका शरीर नीले बादलों की कांति के समान सुन्दर है तथा जो समस्त रसिकों के सरताज हैं। उनकी आँखें मधु से भरी हुई अलसाई हैं एवं किशोरी जी के मुख रूपी चन्द्रमा के लिए चकोर रूपी हैं। वे अपनी अद्भुत रूपमाधुरी के अवलोकन से परमहँसों के भी मन को मोहित करते हैं। ब्रज की निकुंजों में ब्रजरस-प्रेम माधुरी को बरसाते हुए उनको सांयकाल से प्रातः काल हो जाता है। 'कृपालु' कहते हैं कि हम तो निरन्तर ही गौर श्याम-रसयुक्त प्रेम-सुधा-माधुरी का पान करते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 428-429