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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 48

हमारो पिय प्रानन प्यारो।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro piya prānana pyāro

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारो पिय प्रानन प्यारो।

2जाको अंग अंग अस प्यारो, शत अनंग वारो।

3झूमत मोर मुकुट मतवारो, कनक मुकुट न्यारो।

4कच केतिक कारो घुँघरारो, श्रुति कुंडल धारो।

5लोचन चपल सहज कजरारो, जेहि मोहिनि डारो।

6कह “कृपालु” एतिक प्यारो पिय, रसिकन कह कारो॥

हिन्दी भावार्थ

हमारे प्रियतम श्यामसुन्दर प्राणों से भी अधिक प्यारे हैं। उनके प्रत्येक अंग इतने प्यारे हैं कि उन पर अगणित कामदेव चारे जा सकते हैं। मतवाली चाल के कारण मतवाले मोर-मुकुट का झूमना, साथ ही स्वर्ण के मुकुट की बाँकी झाँकी भी अत्यन्त ही शोभनीय है। उनके घुंघराले काले काले बाल एवं कान के हिलते हुए कुण्डल नितान्त सुन्दर हैं। उनके स्वभावतः कजरारे चंचल नेत्र बरबस मोहित करने चाले हैं। 'कृपालु' कहते हैं, मुझे आश्चर्य है कि इतने प्यारे प्रियतम श्यामसुन्दर को भी रसिक लोग काला कहते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 428