श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 44
हमारो, कान्ह प्रान को प्रान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro kānha prāna ko prāna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो, कान्ह प्रान को प्रान।
2आजु सखी! हौं करन गई रहि, यमुना महँ असनान।
3तहँ दुर्वासा मरम बतायो, दै वेदादि प्रमान।
4मुनि इमि कह इंद्रिय मन बुधि कहँ, जिमि प्रिय प्रान बखान।
5तिमि इन प्रानन प्रान जान उन, सुंदर श्याम सुजान।
6कह “कृपालु” तबही सखि! लागत, प्रानन प्यारो कान्ह॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे श्यामसुन्दर आत्मा की भी आत्मा हैं। अरी सखि! आज मैं यमुना-स्नान करने गयी थी, वहां दुर्वासा मुनि ने वेदादिकों के प्रमाण द्वारा यह रहस्य बताया। उन्होंने कहा जिस प्रकार इन्द्रिय, मन, बुद्धि को प्राण अर्थात् आत्मा, अपने से भी अधिक प्रिय है, उसी प्रकार आत्मा को भी, आत्मा की आत्मा-परमात्मा अर्थात श्यामसुन्दर अधिक प्रिय हैं। 'कृपालु' कहते हैं-अरी सखि! इसी कारण से श्यामसुन्दर प्राणों से भी अधिक प्यारे लगते हैं। यह रहस्य आज समझी।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 425