श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 45
हमारो ठाकुर नंद कुमार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro ṭhākura nandakumāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो ठाकुर नंद कुमार।
2चिदानंदमय नील बदन पर, इंद्रनील मणि वार।
3मुकुट ग्रीव कटि पद टेढ़ो करि, ठाढ़ो कुंज मझार।
4सुबरन बरन लसत कटितट पट, मुकुट लटक बलिहार।
5काँधे लकुटि भृकुटि अति बाँकी, कटि काछनि रिझवार।
6शुक सनकादि “कृपालु” लखत नित, लता विटप तनु धार॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे स्वामी एकमात्र नंदकुमार ही हैं। जिनके चिदानन्द नीले रंग की देह पर मैं इन्द्रनीलमणि को न्यौछावर करता हूँ। वे मुकुट, ग्रीवा, कमर एवं पैरों को टेढ़ा करके कुंज में खड़े हैं। सुवर्ण के रंग का पीताम्बर पहने हुए हैं। मोर मुकुट के झूमने पर तो मैं बलिहार जाता हूँ। उनके कंधे पर लठिया है, उनकी भौंह अत्यन्त सुन्दर हैं एवं उनकी कमर में मनोहर काछनी है। 'कृपालु' कहते हैं कि उनकी झाँकी को देखने के लिये शुक, सनकादिक परमहंस लता, वृक्ष आदि के शरीर धारण किये हुए देख रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 425-426