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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 46

हमारो छैल छबीलो श्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro chhaila chhabīlo shyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारो छैल छबीलो श्याम।

2रसिक रँगीलो गुन गर्वीलो, नीलो तनु अभिराम।

3धेनु चरावत बेनु बजावत, अति मनभावत भाम।

4झूमत मोर मुकुट मुख चूमत, घूमत लट छविधाम।

5काँधे पीतपटी दुपटी कर, लिपटी लकुटि ललाम।

6कर कंकन कटि किंकिनि बाजति, पायल बाजति पाम।

7कर “कृपालु” जब नैन-सैन तब, ह्वै गयो काम तमाम॥

हिन्दी भावार्थ

हमारे श्यामसुन्दर बड़े ही छबीले हैं। वे रसिकों को आनन्द देने बाले हैं गुणों के सागर हैं उनका शरीर सुन्दर नीले वर्ण का है। मुरली बजाते हुए गाय चराते हैं एवं गोपियों के मन को अत्यधिक लुभाते हैं। उनके सिर पर मोर मुकुट झूमता रहता है। उनकी छबीली घुँधराली अलके मुख पर विहार करती हैं। उनके कंधे पर दोनों ओर पीताम्बर फहराता है एवं उसी से लिपटी हुई लठिया भी अत्यन्त शोभा देती रहती है। उनके हाथ में कंकण, कमर में करधनी एवं चरणों में नृपुर की कमक कट क कक मधुर ध्वनि होती रहती है। 'कृपालु' कहते हैं कि जब वे किसी के ऊपर कटाक्ष कर देते हैं तब तो मागो उसका बंटाढार ही हो जाता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 426-427