श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 43
हमारो ऐसो सुंदर श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro aiso sundara shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो ऐसो सुंदर श्याम।
2जैसो नहिं कहुँ तीनि लोक महँ, कारुणीक अभिराम।
3जो नहिं गयेउ बुलायेहु पै नृप, दुर्योधन के धाम।
4सोइ सप्रेम लगवाय तिलक किय, कुबरिहिं पूरनकाम।
5जिनके चरण पलोटति निशिदिन, पद्माहूँ सी बाम।
6सो “कृपालु” बलि जात पलोटत, कुंजविहारिणि पाम॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे श्यामसुन्दर ऐसे करुणा वरुणालय हैं जैसा तीनों लोक में कोई नहीं है। जो श्यामसुन्दर सम्राट दुर्योधन के बुलाने पर भी उसके महल में नहीं गये, उन्हीं श्यामसुन्दर ने प्रेमयुक्त कुबरी सरीखी स्त्री के हाथों द्वारा बरबस तिलक लगवाकर उसे पूर्णकाम बना दिया। जिनके चरण कमलों को महालक्ष्मी सरीखी अरद्धागिनी निरन्तर दबाया करती हैं, 'कृपालु' कहते हैं कि वे ही श्यामसुन्दर, वृषभानुनन्दिनी राधिका के चरणों को पलोटते हुए बलिहार जाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 424-425