श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 42
हमारो ऐसो मदन गोपाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro aiso madanagopāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हमारो ऐसो मदन गोपाल।
2जैसो नहिं कहुँ तीनि लोक महँ, ह्वैहैं तीनिहुँ काल।
3बिनु प्रयास जो सकल जगत को, पालन बनि प्रतिपाल।
4सोइ माँगत यशुमति ते रोटी, ठुनकि ठुनकि नँदलाल।
5जिनके भय भयभीत होत भय, अमित काल जेहि गाल।
6सोइ “कृपालु” छुपि सभय खात रज, लखि न लेइ कोउ ग्वाल॥
हिन्दी भावार्थ
हमारे मदन गोपाल जितने दयालु हैं उतना दयाल तीनों लोकों में, तीनों काल में, कहीं भी, कोई भी, नहीं ह सकता। सम्पूर्ण विश्व के भरण पोषण करने वाले जिन भगवान ह परिश्रम नहीं पड़ता, वही ब्रह्म नन्दलाल बनकर मचल-मचलकर यशोदा मैया से रोटी माँग रहा है। जिनके डर से डर भी डरता है एवं जिनके गाल में अनंत यमराज समाये हुए हैं, 'कृपालु' कहते हैं कि वही नन्दलाल डर के मारे चुपके से ब्रजरज खा रहा है कि कहीं कोई ग्वाल न देख ले और मैया से शिकायत न कर दे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 423-424