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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 41

हमारो अलबेलो नँदलाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hamāro alabelo naṁdalāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1हमारो अलबेलो नँदलाल।

2झूमत चलत प्रमत्त चाल सों, लजवत बाल मराल।

3अति रस भरे नैन जित घूमत, तित सब होत बेहाल।

4मोर मुकुट पट पीत मनोहर, लट उरझी घुँघराल।

5श्रुति कुंडल नासा भल बेसर, उर दुकूल वनमाल।

6पग नूपुर कटि किंकिनि अरु मुख, मुरली शब्द रसाल।

7लखतहिं बनत “कृपालु” न बरनत, कुकवि बजावत गाल॥

हिन्दी भावार्थ

(एक सखि दूसरी सखि से अपने प्रियतम श्यामसुन्दर की रूप माधुरी का वर्णन करती है।) हे सखि! हमारे श्यामसुन्दर बड़े ही अनोखे हैं। वे मस्त चाल से जब चलते हैं तो उनकी उस मदभरी चाल को देखकर बालहंस भी लजा जाता है। उनके नेत्र रस से परिपूर्ण हैं और चे उन रसभरे मदमाते नेत्रों से जिस ओर देख लेते हैं, वहीं सबके हृदय को अनायास ही अपनी ओर खींचकर बेसुध बना देते हैं। उनके सिर पर सुन्दर मोर-मुकुट विराजमान है, सुन्दर पीताम्बर को धारण किये हैं और उनके घुँघराले केश एक दूसरे से उलझ रहे हैं, कानों में कुण्डल हैं, नासिका में बड़ी ही प्रिय लगनेवाली बुलाक है और वक्षस्थल पर मनोहारी बनमाला सुशोभित हो रही है। पैरों में पैजनियाँ, कमर में करधनी और मुख से रसभरी मुरली की ध्वनि निकल रही है। 'कृपालु' कहते हैं कि बस प्रियतम श्यामसुन्दर की उपर्युक्त छवि केवल देखते ही बनती है। वाणी उसका वर्णन करने में पूर्णतया असमर्थ है, यह मूर्ख कवि तो इस छवि को बताकर केवल गाल बजा रहा है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 422-423