श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 40
हम देखे श्यामलगात रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hama dekhe shyāmala gāta re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हम देखे श्यामलगात रे।
2मधुर मधुर धुनि बेनु बजावत, गैयन पाछे जात रे।
3काँधे कनक लकुटि कामरि अरु, पीतांबर फहरात रे।
4चितवनि-चोट चलावत मुरि मुरि, मंद मंद मुसकात रे।
5सँग धनसुख मनसुख श्रीदामा, अगनित सखन जमात रे।
6झूमि “कृपालु” चलत पुनि देखत, घूमि यशोमति मात रे॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि अपनी अन्तरंग सखि के प्रश्न का उत्तर देती हुई कहती है कि हमने श्यामसुन्दर को देखा है। मधुर मधुर मुरली बजाते हुए गायों के पीछे जा रहे थे। उनके कंधे पर सुवर्ण की लठिया एवं काली कामरी सुशोभित थी तथा पीताम्बर फहरा रहा था। वे कटाक्षपात करते हुए देख रहे थे एवं मुड़ मुड़कर मन्द-मन्द मुंस्करा रहे थे। उनके संग में धनसुख, मनमुख, श्रीदामा आदि सहस्रों सखाओं का समूह था। 'कृपालु' कहते हैं कि श्यामसुन्दर झूमते हुए आ रहे थे एवं बार-बार घूम-घूमकर प्रेम के कारण यशोदा मैया को देखते जाते थे।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 421-422