श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 39
हम किंकर कुंज बिहारी के।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: hama kiṅkara kuñjabihārī ke
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1हम किंकर कुंज बिहारी के।
2रहहुँ निडर नहिं डरहुँ, डरहुँ डर, केवल बल बनवारी के।
3विचरौं झूमि झूमि ब्रज वीथिन, गाऊँ गुन गिरिधारी के।
4खाऊँ टूक पिवूँ यमुना जल, दास न लोटा थारी के।
5लखि व्यवधान विधान वेद को, ढिंग न जाउँ श्रुति चारी के।
6करि करि सुरति “कृपालु” जाउँ बलि, चरित यार की यारी के॥
हिन्दी भावार्थ
हम केवल कुंजबिहारी के ही दास हैं। हम निर्भ रहते हैं एवं केवल बनवारी के बल से साक्षात् भय के भय र आ भयभीत नहीं होते। गिरिधारी के गुणों को गाते हुए झूम झूम कर ब्रज की गलियों में विचरते रहते हैं। मधुकरी माँ कर खा लेते हैं, यमुना में पानी पी लेते हैं अतएव लोटा थाल के भी गुलाम नहीं हैं। बेद के विधि निषेध को बाधक समः कर हम चारों वेदों के पास तक नहीं फटकते। "कृपालु कहते हैं कि हम अपने प्रियतम, श्यामसुन्दर को प्रेममर लीलाओं का चिंतन करते हुए बलिहार जाते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 421