श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 38
सबै सखि! चूमत मुख नँदलाल।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: sabai sakhi! chūmata mukha naṁdalāla
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1सबै सखि! चूमत मुख नँदलाल।
2झुकि झुकि झूमि झूमि चूमति मुख, लटकारी घुँघराल।
3कानन कुंडलहूँ झुकि झूमत, चूमत मुख गोपाल।
4नासा बेसरहूँ झुकि झूमति, चूमति मुख सब काल।
5मोहन कर मुरलिहुँ झुकि झूमति, चूमति मुखहिं रसाल।
6करत “कृपालु” रास झुकि झूमति, चूमति मुख ब्रजबाल॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! चूम रहे हैं! म कर मुख चूम रही हैं। मता हुआ मुख चूम रहा है। ककर झुमती हुई सदा मुख चूम रही है। में नित्य विराजमान मुरली झुक-झुककर झूमती हुई मुख चूम रही है।'कृपालु' कहते हैं कि रास करते समय ब्रजाँगनाएं भ झुक-झुककर झूमती हुई मुख चूमती रहती हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 420-421