# हमारो अलबेलो नँदलाल।

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भाषा: हिन्दी / ब्रज
स्रोत पहचान: PRM-0429-M09-K041
मूल रचना: प्रेम रस मदिरा — जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
माधुरी: श्रीकृष्ण-माधुरी
स्थानीय पद संख्या: 41
मूल पद के स्रोत पृष्ठ: 201–202

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## मूल पद

<a id="line-1"></a>हमारो अलबेलो नँदलाल।  
<a id="line-2"></a>झूमत चलत प्रमत्त चाल सों, लजवत बाल मराल।  
<a id="line-3"></a>अति रस भरे नैन जित घूमत, तित सब होत बेहाल।  
<a id="line-4"></a>मोर मुकुट पट पीत मनोहर, लट उरझी घुँघराल।  
<a id="line-5"></a>श्रुति कुंडल नासा भल बेसर, उर दुकूल वनमाल।  
<a id="line-6"></a>पग नूपुर कटि किंकिनि अरु मुख, मुरली शब्द रसाल।  
<a id="line-7"></a>लखतहिं बनत “कृपालु” न बरनत, कुकवि बजावत गाल॥

<a id="meaning"></a>
## हिन्दी भावार्थ

(एक सखि दूसरी सखि से अपने प्रियतम श्यामसुन्दर की रूप माधुरी का वर्णन करती है।) हे सखि! हमारे श्यामसुन्दर बड़े ही अनोखे हैं। वे मस्त चाल से जब चलते हैं तो उनकी उस मदभरी चाल को देखकर बालहंस भी लजा जाता है। उनके नेत्र रस से परिपूर्ण हैं और चे उन रसभरे मदमाते नेत्रों से जिस ओर देख लेते हैं, वहीं सबके हृदय को अनायास ही अपनी ओर खींचकर बेसुध बना देते हैं। उनके सिर पर सुन्दर मोर-मुकुट विराजमान है, सुन्दर पीताम्बर को धारण किये हैं और उनके घुँघराले केश एक दूसरे से उलझ रहे हैं, कानों में कुण्डल हैं, नासिका में बड़ी ही प्रिय लगनेवाली बुलाक है और वक्षस्थल पर मनोहारी बनमाला सुशोभित हो रही है। पैरों में पैजनियाँ, कमर में करधनी और मुख से रसभरी मुरली की ध्वनि निकल रही है। 'कृपालु' कहते हैं कि बस प्रियतम श्यामसुन्दर की उपर्युक्त छवि केवल देखते ही बनती है। वाणी उसका वर्णन करने में पूर्णतया असमर्थ है, यह मूर्ख कवि तो इस छवि को बताकर केवल गाल बजा रहा है।

भावार्थ के स्रोत पृष्ठ: 422-423

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## पद का स्रोत और उद्धरण

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मूल रचना: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज। पद और उपलब्ध हिन्दी भावार्थ प्रकाशित पुस्तक के उपलब्ध स्कैन से लिए गए हैं; ये कृत्रिम बुद्धिमत्ता से रचित पद या भावार्थ नहीं हैं। माधुरी और भक्ति चैलेंज के सजावटी चित्र Codex से बनाए गए हैं। वे मूल प्रकाशित पाठ, स्कैन और प्रकाशक के चित्रों से अलग हैं। पुस्तकालय के आवरण उपलब्ध PDF के आवरण/मूल पृष्ठ या प्रकाशक के प्रतिनिधि चित्र हैं; चित्र से संस्करण की समानता सिद्ध नहीं होती।

प्रकाशक के अनुसार प्रेम रस मदिरा में २१ माधुरियों में १,००८ पद हैं। संग्रह में उपलब्ध स्रोत-अभिलेखों की स्थायी पहचान सुरक्षित रखी गई है; संख्या के अंतर का समाधान अभी लंबित है। पाँच हिन्दी भावार्थ उपलब्ध नहीं हैं। हिन्दी भावार्थ पूरे पद का है। पाठ में स्कैन से लिप्यंतरण की त्रुटियाँ रह सकती हैं। यह पाठ पुनर्वितरण की अनुमति नहीं देता।

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मूल रचना की प्रथम प्रकाशन तिथि के उपलब्ध विवरण अलग हैं; इस संग्रह में उसका कोई एक निश्चित वर्ष नहीं माना गया है। अंग्रेज़ी संस्करण का अक्टूबर २००९ का प्रथम-संस्करण वर्ष मूल रचना के प्रथम प्रकाशन का वर्ष नहीं है।
