श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 17
देहु सखि! तन मन प्रानन कान्ह।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dehu sakhi! tana mana prānana kānha
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1देहु सखि! तन मन प्रानन कान्ह।
2प्राकृत तन मन प्रान मोल दै, ले अमोल मुसकान।
3बारेक लखि मुसकान न रहिहैं, तन मन प्रानन भान।
4जो नहिं देगी दान, लूटिहैं, प्राकृत जन जिय जान।
5पुनि जग जनमि जनमि मरि जैहौं, तिनहिंन तिय पति मान।
6कह “कृपालु” हौं भुज उठाय सखि! कान्हहि, प्रानन-प्रान॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! श्यामसुन्दर को अपना तन, मन, प्राण समर्पित कर दे। मायिक तन, मन, आदि देकर दिव्यानन्दमयी श्यामसुन्दर की मुस्कान खरीद ले। अरी सखि! जब तू एक बार उस मुस्कान को देख लेगी तो तन मन-प्राण की सुधि खो बैठेगी। यदि तू श्यामसुन्दर को उपर्युक्त दान नहीं करेगी तो उसे स्त्री, पति, पिता, पुत्रादि मायाधीन लोग लूट लेंगे। क्योंकि कोई भी एक क्षण को भी निष्क्रिय नहीं रह सकता। उनके लूटने पर अर्थात् उनसे आसक्ति होने पर उन्हीं को बार-बार स्त्री पति मानकर चौरासी लाख योनियों में जन्म ले-लेकर दुः ख पायेगी। 'कृपालु' कहते हैं कि मैं प्रतिज्ञा-पूर्वक विश्वास दिलाता हूँ कि श्यामसुन्दर ही प्राणों के प्राण हैं, अतएव उन पर उन्हीं का स्वाभाविक अधिकार है।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 404