श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 18
धरु नँदनंदन को ध्यान रे।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dharu naṁdanandana ko dhyāna re
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1धरु नँदनंदन को ध्यान रे।
2जाको ध्यान धरत निशि वासर, विधि हरि हर भगवान रे।
3मोर मुकुट लकुटी लपटी पट, लजवति भृकुटि कमान रे।
4चंचल नैन दृंगचल चंचल, अंचलपट फहरान रे।
5गति मदमत्त गयंद लजावनि, मंद मंद मुसकान रे।
6विहरत नित “कृपालु” वृंदावन, रति-रस चतुर सुजान रे॥
हिन्दी भावार्थ
अरे मन! नँदनन्दन का ध्यान कर। जिनका ध्यान ब्रह्मा, विष्णु, शंकर आदि भगवान् भी निरन्तर करते हैं। उन नँदनन्दन के सिर पर सुन्दर मोर मुकुट है एवं पीताम्बर में लकुटी लिपटी हुई है। भौंहों का टेढापन धनुष को भी लज्जित करता है। उनके नेत्र चंचल हैं, कटाक्षपात भी चंचल है एव उनका पीताम्बर भी चंचल गति से लहराता है। उनकी चाल मतवाले हाथी को भी लज्जित करती है। उनकी मुस्कान अत्यन्त ही मधुर है। 'कृपालु' कहते हैं कि वे प्रेम-रस-रसिक शिरोमणि वृन्दावन में नित्य विहार करते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 404-405