श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 16
देखु सखि! बेसर-छवि छविदार।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi! besara-chhavi chhavidāra
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1देखु सखि! बेसर-छवि छविदार।
2कियो कौन तप जासु दियो इन, अस पद नंदकुमार।
3आठों याम पियत यह बेसर, अधर-सुधा-रस-सार।
4झुकि झुकि झूमि झूमि बड़भागिनि, चूमति मुख बलिहार।
5जो कहुँ इन पीतांबर उरझत, सुरझावत रिझवार।
6लखि “कृपालु” बलि जात तबै जब, दर्पण माहिं निहार॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! छबीली बेसर की छवि देख। न जाने इस बेसर ने कौन-सा तप किया है कि जिसके परिणामस्वरूप इसे ऐसा उच्चपद प्राप्त हुआ है। यह बेसर दिन-रात श्यामसुन्दर के अधरामृत का पान करती रहती है! यह बड़भागिनी बार बार झुकती झूमती हुई श्यामसुन्दर के मुख को चूमकर बलिहार जाती है। अगर कहीं इस लाड़िली बेसर में पीताम्बर आकर उलझ जाता है तो श्यामसुन्दर अपने हाथ से सुलझाते हैं। कृपालु' के शब्दों में श्यामसुन्दर उस समय तो फूले नहीं समाते जब उस बेसर को शीशे में देखते हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 403