श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 13
देखु सखि! झूमत आवत श्याम।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi! jhūmata āvata shyāma
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1देखु सखि! झूमत आवत श्याम।
2गति मदमत्त गयंद लजावत, मनभावत ब्रजबाम।
3झुकि झुकि झोंके खाति चंद्रिका, झुकी ग्रीव दिशि बाम।
4मुख आवति पुनि पुनि लटकारी, घुँघरारी अभिराम।
5मुरली मधुर बजाय बुलावत, लै लै सखियन नाम।
6लखि “कृपालु” अनुपम छवि लाजत, कोटि कोटि शत काम॥
हिन्दी भावार्थ
एक सखि अपनी सखि से कहती है कि अरी सखि! उधर देख, झूमते हुए मतवाली चाल से प्रियतम श्यामसुन्दर आ रहे हैं। उनकी चाल मतवाले हाथी को भी लज्जित करने वाली है तथा वे गोपियों के अत्यंत ही मन भाते हैं। मतवाली चाल के कारण उनके सिर की मोर-चंद्रिका झुक-झुककर झूम रही है। उनकी गर्दन बाई ओर झुकी हुई है। उनके मुख पर काली-काली अत्यन्त ही सुन्दर घुंघराली लरें बार-बार आ रही हैं। वे गोपियों के नाम मुरली की ध्वनि में ले-लेकर बुला रहे हैं। 'कृपालु' कहते हैं कि इस अनुपम रूप-माधुरी को देखकर करोड़ों कामदेव लज्जित हो रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 401