श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 12
दृगन बिच हलकैं अलि अलकें।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dṛigana bicha halakaiṁ ali alakeṁ
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1दृगन बिच हलकैं अलि अलकें।
2हम पल पल ललकें देखन कहँ, लखन न दें पलकें।
3चंचल नैन प्रेम रस छलके, श्रुति कुंडल हलके।
4नासा भल मुक्ताहल हलके, पीतांबर झलके।
5मुरि मुरि मृदु-मुसकनि लखि भल के, पुनि पुनि दृग ललके।
6लखु “कृपालु” तुमहूँ हरि अलकें, प्रेमनगर चलके॥
हिन्दी भावार्थ
अरी सखि! हमारी आँखों में श्यामसुन्दर की घुँघराली अलकें हिल सी रही हैं। हम उनको देखने के लिए बिना किसी रोक-टोक के ललचाती रहतीं हैं किन्तु ये पलकें बीच में रुकावट डाल देती हैं। उनके चपल नेत्रं में प्रेम-रस छलकता रहता है। उनके कानों में कुण्डल झूमते रहते हैं। उनकी नासिका में मुक्ताहल हिलता रहता है। उनके वक्षस्थल पर पीताम्बर झलकता रहता है। मुड़-मुड़कर उनके मधुर मुस्कुराने को देखने के लिये आँखें पुन:-पुनः ललचाती रहती हैं। "कृपालु कहते हैं कि तुम भी प्रेम नगर चलकर श्यामसुन्दर के घुँघराले बाल देख लो।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 400