लोड हो रहा है…लोड हुँदैछ…
Skip to main content
RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 11

चुरावति चित चितवनि नँदलाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: churāvati chita chitavani naṁdalāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चुरावति चित चितवनि नँदलाल।

2यद्यपि महाविष्णु के ऐसेहिं, लोचन कमल विशाल।

3पै ना जाने का जादू सखि, इन चितवनि गोपाल।

4इन महँ रति-रस-सरस-प्रेम-रस, छलकत रह सब काल।

5लखत लटू ह्वै जाति भटू सब, उमा रमा सी हाल।

6इक “कृपालु” चितवनि महँ मुर्छित, गिर्यो काम बेहाल॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! श्यामसुन्दर की मनोहर चितवन ने हमारा चित्त चुरा लिया। यद्यपि भगवान् महाविष्णु के भी नेत्र इसी प्रकार कमल के समान बड़े-बड़े हैं, फिर भी श्यामसुन्दर की इस चितवन में पता नहीं क्या जादू भरा हुआ है। अरी सखि! इस चितवन से निरन्तर प्रेम-रस छलकता रहता है। उस चितवन को देखकर उमा, रमा, सरीखी भी तत्काल ही विभोर हो जाती हैं, फिर अन्य अंगनाओं की क्या बात कही जाय। 'कृपालु' कहते हैं कि मैंने तो यहाँ तक सुना है कि उनको एक ही चितवनि में रास के समय कामदेव भी मूर्च्छित होकर गिर पड़ा था।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 399-400