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RADHEY RADHEY

श्रीकृष्ण-माधुरी · पद 14

देखु सखि! नागर नंदकुमार।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: dekhu sakhi! nāgara nandakumāra

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1देखु सखि! नागर नंदकुमार।

2रसिक रँगीलो गुन गर्वीलो, नीलो रंग निहार।

3लटक मुकुट सिर मटक भृकुटि वर, चटक तिलक बलिहार।

4कंध पीतपट लकु टि लिपटि पट, कर मुरली रिझवार।

5गोल कपोलनि अति मृदुबोलनि, मोहत सब ब्रज नार।

6प्यारी प्यारी गति मतवारी, हंस लजावनि हार।

7प्रति अंगनि श्रृंगार-माधुरी, लखि लाजत श्रृंगार।

8लखतहिं बनत “कृपालु” अनूपम, रूप-माधुरी-सार॥

हिन्दी भावार्थ

अरी सखि! रसिक शिरोमणि श्यामसुन्दर को देख वे रसिकों को रिझाने वाले हैं, अनन्त गुणों के भण्डार हैं एवं नीले रंग के हैं। उनके मोर मुकुट की लटक, भौंहों के टेढ़ेपन एवं तिलक की चमक पर मैं बलिहार जाता हूँ। उनके कंधे पर पीला दुपट्टा है एवं उस दुपट्टे पर लपटी हुई लठिया है। हाथ में त्रिभुवन-मोहिनी मुरली है। उनके गाल अत्यन्त गोल हैं तथा उनके बोल अत्यन्त मधुर हैं, जिनसे समस्त ब्रजांगनाएं मोहित हो जाती हैं। हंसों को लज्जित करने वाली उनकी मतवाली चाल बरबस चित्त को चुराने वाली है। उनके प्रत्येक अंग की शृंगार माधुरी को देखकर साक्षात् शृंगार भी लज्जित होता है 'कृपालु' कहते हैं कि अनिर्वचनीय रूप माधुरी बस देखते ही बनती है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 401-402