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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 68

छाँड़ि ब्रज और चलहु कहुँ मात।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chhāṁd̤i braja aura chalahu kahuṁ māta!

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1छाँड़ि ब्रज और चलहु कहुँ मात।

2इन ब्रज वनितनि अति दुख दीनी, अब न मात सहि जात।

3नित प्रति बात बनावति तो सों, बिनुहिं एक कर सात।

4होत एक को सात बहुत पुनि, इनकी बड़ी जमात।

5तुमहिं बताउ मात! हम कैसे, छींकेहिं पहुँचि सकात।

6सबै “कृपालु” एक सी मैया! सुनि सखि मृदु मुसकात॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर मैया से बातें बनाते हुए कहते हैं कि हे मैया! इस ब्रज को छोड़ कर हम लोग कहीं और चले चलें! इन ब्रज गोपियों ने बहुत ही दुःख दिया है जो अब सहा नहीं जाता। यह सब, बिना एक भी बात के सात बात जोड़ कर तुझसे नित्य प्रति कहती हैं। मैया! संसार में एक के विरुद्ध सात व्यक्ति ही बहुत माने जाते हैं, फिर इनकी तो करोड़ों की जमात है। मैया! तुम्हीं बताओ, मैं इतना छोटा सा इन सब के इतने ऊँचे छींके पर किस प्रकार पहुँच सकता हुँ? 'कृपालु के शब्दों में ये सब एक ही सरीखी हैं अर्थात् एक से एक बढ़ कर हैं। सखियाँ बालकृष्ण के इन वचनों को सुनकर मंद-मंद मुस्कराने लगीं कि देखो!! यह छोटा सा छोरा कैसी बातें बना लेता है।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 328-329