श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 67
ग्वालिनी! अबहुँ बात ले मान।
पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: gwālinī! abahuṁ bāta le māna
मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज
मूल पद
1ग्वालिनी! अबहुँ बात ले मान।
2हौं अति हठी, दान बिनु लीन्हे, नहिं जैहौं जिय जान।
3हठ करिहौं, मटुकीहुँ गमैहौ, घर जैहौ खिसियान।
4"दारी के"गारी को गूजरि!, हौं नहिं करिहौं कान।
5रार बढ़ेगी दिन प्रति दूनी, अति को बुरो गुमान।
6बड़भागिनि “कृपालु” ग्वालिनि जेहि, भीख माँग भगवान॥
हिन्दी भावार्थ
दही का दान माँगते हुए श्यामसुन्दर एक सखि से कहते हैं, अरी ग्वालिन! अब भी अवसर है, बात मान ले। मैं अत्यन्त हठी हूँ। बिना दही का दान लिये नहीं जाऊँगा, यह तू पक्का समझ ले। यदि तू हठ करेगी तो अपनी मटुकी से भी हाथ धो बैठेगी एवं खिसियानी सी वापस जायेगी। 'दारी के इस गाली का मेरे ऊपर कोई प्रभाव न पड़ सकेगा (मुझे तो भगवान् होने के कारण प्रतिदिन लाखों गाली मिला ही करती हैं।) देख सखि! तू इसी मार्ग से प्रतिदिन दही बेचने जायेगी। अतएव दिन-प्रतिदिन झगड़ा बढ़ता ही जायेगा। मात्रा से अधिक अहंकार हानिकारक होता है। अतएव दही का दान दे दे। कृपालु' कहते हैं कि वह ग्वालिन कितनी भाग्यशालिनी है कि जिससे स्वयं भगवान् दही की भीख माँग रहे हैं।
प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।
भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 328