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RADHEY RADHEY

श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 18

चलत सखि, लटपटात नँदलाल।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: chalata sakhi, laṭapaṭāta naṁdalāla

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1चलत सखि, लटपटात नँदलाल।

2हौले हौले धरणि धरत पग, भोले से गोपाल।

3चलत चलत छुटि जात पीतपट, हँसति सबै ब्रज बाल।

4पुनि पुनि पहिरावति पीतांबर, यशुमति होति निहाल।

5जहँ देखत माटी चुपके ते, डारत मुख ततकाल।

6तर्जनि ते “कृपालु” डरपावत, मुख माटी लखि ग्वाल॥

हिन्दी भावार्थ

श्री नन्दनन्दन अड्बड़ाते हुये चल रहे हैं। भोले भाले से श्यामसुन्दर धीरे धीरे पृथ्वी पर पैर रखते हैं। चलते चलते बार-बार पीताम्बर खुल जाता है, जिसे देखकर समस्त ब्रजांगनाएं हँसने लगती हैं। यशोदा मैया विभोर होकर बार बार पीताम्बर पहनाती हैं। बालकृष्ण जहाँ कहीं भी मिट्टी देखते हैं चुपके से मुँह में डाल लेते हैं। कृपालु' के कथनानुसार माटी खाते हुए बालकृष्ण को देखकर ग्वालबाल तर्जनी अँगुली से डराते हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 281-282