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श्री कृष्ण-बाल लीला-माधुरी · पद 17

नवनि मुख मंडित सुंदर श्याम।

पुस्तक का रोमन लिप्यन्तरण: navani mukha maṇḍita sundara shyāma

मूल पद के लेखक: जगद्गुरु श्री कृपालु जी महाराज

मूल पद

1नवनि मुख मंडित सुंदर श्याम।

2कछु कर कछु मुख कछु तनु लेपित, कछु मुख दे बलराम।

3घुटुवनि चलत चरन पैजनियनि, रुनझुन धुन अभिराम।

4गति सों मोर मुकुट झुकि झूमत, पग चूमत शत काम।

5कुंडल हलकनि झँगुलिन झलकनि, किलकनि दशन ललाम।

6बलि बलि जात “कृपालु” ओट ते, देखि यशोमति भाम॥

हिन्दी भावार्थ

श्यामसुन्दर कुछ मक्खन तो हाथ में लिये हुए हैं कुछ मुख में लिये हैं, कुछ शरीर में लपेटे हैं एवं कुछ मक्खन बलराम के मुख में देते हुए सुशोभित हो रहे हैं। घुटने के बल चलने के कारण चरण कमलों की पायल की रुनझुन ध्वनि चित्त को चुरा रही है। चाल के अनुसार ही मोर मुकुट भी झुक-झुक कर झोके खा रहा है। इस झाँकी को देखकर सैकड़ों कामदेव श्यामसुन्दर के पैर चूमते हैं। श्यामसुन्दर के कुंडल का हिलना झँगुली का झलकना, दाँतों का किलकना अत्यन्त ही मनोहर है। कृपालु' कहते हैं कि उपर्युक्त झाँकी को ओट से देखती हुई यशोदा मैया आनन्द में विभोर होकर बलिहार जाती हैं।

प्रकाशित पुस्तक से लिप्यंतरित पूरे पद का भावार्थ। स्रोत में पंक्ति-दर-पंक्ति या शब्द-दर-शब्द अर्थ नहीं दिया गया है।

भावार्थ स्रोत पृष्ठ: 281