Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
हाय मोरा पिया बिनु जिया घबराय,
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1हाय मोरा पिया बिनु जिया घबराय,
2रहि नहिं जाय, काऊ कहि नहिं जाय।
3जब ते लखी मैं सखि छवि बलभाय,
4तब ते न इक पल कल कहुँ पाय।
5कहा करुँ कहाँ जावुँ कोउ तो बताय,
6जित देखुँ तित सोइ सुरति लखाय।
7तन धन परिजन सुख नहिं भाय,
8भरि भरि दृग अँसुवन झरि लाय।
9दिन महँ छिन छिन विरह सताय,
10करवट बदलत रैन बिताय।
11पुनि पुनि उठत हूक हिय हाय,
12जिउँ नहिं मरुँ नहिं तलफुँ सदाय।
13काउ सों कहन की भी बात नहिं आय,
14काउ सों कहूँ तो होय और हँसाय।
15रोम रोम साँवरी सुरति रहि छाय,
16और और आवै सुधि जो बिसराय।
17मन नहिं मानै गइ हारि समुझाय,
18तू ही बताय कछु याय उपाय।
19एक बार, आय सोइ छवि दिखराय,
20जाके तू “कृपालु” समुझाय ढिग वाय।
21भावार्थ—कोई विरहिणी अपनी सखी से कह रही है-प्रियतम
22के बिना मेरा हृदय व्याकुल हो रहा है। मैं उनके बिना रह नहीं
23पाती। इस प्रेम-पीड़ा को किसी से कह भी नहीं सकती। जब से
24मैंने श्रीकृष्ण का दर्शन किया है, मेरी यह दशा हो गई है। मुझे
25कौन बताये कि मैं क्या करूँ? कहाँ जाऊँ? जिधर भी दृष्टि डालती
26हूँ, वही छवि दिखाई देती है। शरीर का सुख मुझे सुहाता नहीं। धन
27एवं परिवारी-जन भी मुझे नहीं अच्छे लगते। बार-बार नेत्रों में जल
28भर आता है। दिन तो विरह की व्यथा सहते हुए व्यतीत होता है,
29रात्रि करवट बदलते हुए समाप्त हो जाती है। हृदय में हूक सी
30उठती है। न तो मैं जीवित हूँ, न मृतक ही हूँ। अपनी इस दशा को
31किसी से कह भी नहीं सकती। यदि किसी से कहूँगी तो सुनकर
32लोग मेरी हँसी ही उड़ायेंगे। मेरे रोम-रोम में श्यामसुन्दर की छवि
33समा गई है। भुलाना चाहती हूँ और भी स्मरण होता है। इस मन
34को समझाकर थक गई किंतु यह मेरी नहीं सुनता। श्री कृपालुजी के
35शब्दों में- हे सखी! तुम श्यामसुन्दर को समझाना कि वे केवल
36एक बार मेरे निकट आकर अपनी वही छवि मुझे पुनः दिखा दें।