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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

एक बात पूछूँ प्यारी साँची बतराय,

Reading 112 of 112 · Source no. 100 · Source PDF 205–207

1एक बात पूछूँ प्यारी साँची बतराय,

2मैं तो तोरी साँची सखी मोते न छुपाय।

3आजु काल तेरो हाल अटपट आय,

4कभु मौन धारे तोहिं दीखे न सुनाय।

5कभु लखे इकटक टकटकी लाय,

6कभु जनु योगी बनि ध्यान लगाय।

7कभु तोरा तनु काँपे कभु बिलखाय,

8कभु तोरे रोम रोम पुलक लखाय।

9कभु दृग आनँद जल बरसाय,

10कभु रोये कभु हँसे कभु बलि जाय।

11कभु करे मान कभु आपुहीं मनाय,

12कभु गिरे भू पै कहि मुख हाय हाय।

13प्यारी कह तोहिं सखि कैसे समुझाय,

14प्रेम रोग ऐसो तू न समुझि सकाय।

15स्वाद न बताये जैसे गूँगा गुड़ खाय,

16ऐसे सहि जाय प्रेम कहि नहिं जाय।

17मोते तू बताय चाहे मोते न बताय,

18जान्यो री “कृपालु” गयो भाय बलभाय।

19भावार्थ—श्रीराधा की किसी सखी ने उनसे प्रश्न किया-हे

20राधे! मैं तुमसे एक बात जानना चाहती हूँ। सच बताना। मैं तो

21तुम्हारी अन्तरंग सखी हूँ, मुझसे कुछ न छिपाना। तुम्हारी कुछ

22विचित्र ही दशा दिखाई देती है। कभी तो तुम बिल्कुल मौन धारण

23कर लेती हो। ऐसा प्रतीत होता है कि न कुछ देखती हो न सुनती

24हो। कभी टकटकी बाँधकर देखती ही रहती हो, कभी योगी की

25भाँति ध्यान लगाती हो। कभी तुम्हारा शरीर काँपने लगता है तो

26कभी व्याकुल होकर बिलखती हो। कभी तुम्हारा रोम-रोम रोमांचित

27हो उठता है। कभी नेत्रों से आनन्द-जल की वर्षा होती है। कभी

28रोती हो, कभी हँसती हो, कभी बलिहार जाती हो। कभी मान

29करती हो तो कभी स्वयं ही मनाती हो। कभी मुख से “हाय हाय”

30कर पृथ्वी पर गिर जाती हो। श्रीराधा ने उत्तर दिया-हे सखी! मैं

31तुझे कैसे बताऊँ? तुम प्रेम-रोग को नहीं समझ सकोगी। जिस

32प्रकार गूँगा गुड़ खाकर उसके स्वाद को नहीं बता सकता, उसी

33प्रकार प्रेम सहन ही करने योग्य है, कहने योग्य नहीं है। सखी ने

34कहा-मैं समझ गई, अब तुम बताओ या न बताओ तुम्हें कृपालु

35श्रीकृष्ण से प्रेम हो गया है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version