Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
भूलेहु भूलो जनि राधे, राधे राधे राधे।
Reading 66 of 112 · Source no. 54 · Source PDF 119–121
1भूलेहु भूलो जनि राधे, राधे राधे राधे।
2मैं तो तेरी मायावश भूल्यो,
3मैं भी तेरी तु ही मेरी राधे, राधे राधे राधे।
4तेरी माया एक अविद्या राधे,
5रज तम गुण युत राधे, राधे राधे राधे।
6तेरी माया दूजी विद्या राधे,
7युक्त सत्व गुण राधे, राधे राधे राधे।
8ज्ञानिन योगिन साधन राधे,
9जाय अविद्या राधे, राधे राधे राधे।
10बिनु तेरी अनुकंपा राधे,
11जाय न विद्या राधे, राधे राधे राधे।
12जा पर कृपा करहु तुम राधे,
13दोउ माया जाय राधे, राधे राधे राधे।
14याते वेद शास्त्र कह राधे,
15साधनबल तजु राधे, राधे राधे राधे।
16चरण शरण गहु रानी राधे,
17भाजै माया राधे, राधे राधे राधे।
18मन पुकार क्रंदन करि राधे,
19आवेंगी भजि राधे, राधे राधे राधे।
20श्वास श्वास जपु राधे राधे,
21उर “कृपालु” धरि राधे, राधे राधे राधे॥
22भावार्थ—हे श्रीराधे! तुम मुझे न भुलाना। तुम्हारी माया की
23अधीनता स्वीकार करने के कारण मैं यह भूल गया कि मैं तुम्हारा
24हूँ, तुम ही मेरी हो। यद्यपि तुम्हारे लिये तो सम्पूर्ण सृष्टि ही है
25परन्तु मेरी तो एकमात्र तुम ही हो। हे श्रीराधे! तुम्हारी एक माया तो
26अविद्या है, जो रजोगुण एवं तमोगुण से युक्त है। दूसरी माया विद्या
27है, जो सत्वगुण से युक्त है। ज्ञानी एवं योगी अपने साधन-बल से
28अविद्या-माया को नष्ट कर देते हैं। विद्या माया तो श्रीराधा की
29कृपा से ही नष्ट होती है। हे श्रीराधे! जिस पर तुम कृपा करती हो,
30उसकी दोनों माया नष्ट हो जाती हैं। इसीलिये वेद शास्त्र साधन-
31बल का परित्याग करने को कहते हैं। जो अपने साधन का आश्रय
32छोड़कर श्रीराधा के चरण-कमलों के शरणागत हो जाता है, उसकी
33माया नष्ट हो जाती है। हे मेरे मन! यदि तू करुण-क्रन्दन पूर्वक
34श्रीराधा का आह्वान करता है तो अत्यन्त कोमल-हृदया श्रीराधा शीघ्रता
35पूर्वक दौड़ती हुई तेरे समक्ष आ जायेंगी। अतः तू श्वास प्रति श्वास
36से राधा नाम का जप कर साथ ही हृदय में कृपालु श्रीराधा की
37दिव्य छवि को धारण कर।