Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सब रोग उपचार वैद्य बताय,
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1सब रोग उपचार वैद्य बताय,
2प्रेम रोग ही है जो असाध्य कहलाय।
3एक रोग काम क्रोध आदि बतलाय,
4जिनते हैं हारे योगी ज्ञानी श्रुति गाय।
5काम क्रोध आदि रोग मानस कहाय,
6जाको कृष्ण भक्ति निर्मूल नसाय।
7एक रोग तो शरीर ते ही उपजाय,
8याको औषधि बल वैद्य भगाय।
9एक रोग और कर्मजन्य जन पाय,
10वाउ भोग करि जन मुक्त ह्वै जाय।
11प्रेमरोग की जो औषधि करवाय,
12बाढ़ै छिन छिन यह ऐसी है बलाय।
13यदपि जगद्गुरु श्यामा श्याम आय,
14दोउ ज्ञान आनँदमय भी सदाय।
15दोनों सर्व समरथ सर्वशक्ति भाय,
16तिनहुँ “कृपालु” यह रोग सताय।।
17भावार्थ—सभी रोग वैद्य द्वारा उपाय बताये जाने से शान्त हो
18जाते हैं। एक प्रेम-रोग ही ऐसा है जिसको शान्त करने का कहीं कोई
19उपाय नहीं है। काम, क्रोध आदि मानसिक रोगों से तो योगी एवं
20ज्ञानी भी पराजित हो जाते हैं, वेद ऐसा ही कहता है। इन मानसिक
21रोगों को कृष्ण-भक्ति ही जड़ से उखाड़ फेंकती है। शारीरिक-
22रोगोंको सांसारिक-वैद्य औषधि के बल से नष्ट कर देते हैं। कर्मों
23के फल स्वरूप जो रोग प्राप्त होते हैं, वे भोगने से ही नष्ट होते हैं।
24प्रेम-रोग का कोई उपचार नहीं है। यह तो एक बार जिसे लग जाता
25है फिर क्षण-क्षण वृद्धि को ही प्राप्त होता है। यद्यपि श्रीराधाकृष्ण
26जगद्गुरु हैं। ये दोनों सच्चिदानन्दमय भी हैं। श्री कृपालुजी कहते हैं-
27ये दोनों सर्वसमर्थ एवं सर्वशक्तिमान भी हैं फिर भी ये प्रेम-रोग से
28पीड़ित रहते हैं।