Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
बलिहार बलिहार तिन ब्रजनार,
Reading 68 of 112 · Source no. 56 · Source PDF 122–124
1बलिहार बलिहार तिन ब्रजनार,
2जिनके अधीन रहे हरि साकार।
3जो था जग का अनादि पिता भरतार,
4सोइ बना ब्रज शिशु नंद कुमार।
5जाके डर डरे डर श्रुतिन उचार,
6सोइ डरे मैया कर साँटिहिं निहार।
7जाकी माया ने नचाया सारा संसार,
8सोइ नाचे बूढ़ी यशुमति कर तार।
9जिन माया विधि हरि हर गये हार,
10सोइ नाचे गोपी छाछ पर बलिहार।
11जिन नाम के प्रताप मिले मुक्ति चार,
12सोइ बँध्यो उखल दृगन जलधार।
13जिन आगे माँगेँ भीख ज्ञानी योगी झार,
14सोइ गोपी आगे माँगे भीख दे दे प्यार।
15प्यार के हैं वश हरि बस यह सार,
16जानि लेहु जो “कृपालु” जाननिहार।
17भावार्थ—कवि कहता है कि मैं उन ब्रजगोपियों पर बलिहार
18जाता हूँ जिन्होंने अपने प्रेम के बल पर ब्रह्म के साकार स्वरूप
19श्रीकृष्ण को अपने आश्रित कर लिया है। जो श्रीकृष्ण अनादिकाल
20से ही जगत् के पिता एवं पति हैं नन्द वही यशोदा एवं नन्द के
21वात्सल्य-प्रेमवश ब्रज में साधारण शिशु की भाँति ही क्रीड़ा कर
22रहा है। वेद जिस ईश्वर के भय से भय को भयभीत हुआ बताता
23है, वही पूर्णतम ब्रह्म कृष्ण ब्रज में माता यशोदा के हाथ की साँटी
24को देखकर भय से काँप रहा है। जिसकी माया से सम्पूर्ण संसार
25भ्रमित होकर उसके संकेत के अनुसार ही चेष्टा करता है, वही
26ब्रह्म वृद्धा यशोदा के हाथ की ताली पर नाचता है। जिसकी माया
27ने ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव को भी पराजित कर दिया, वही साकार
28ब्रह्म किसी ब्रज-गोपी द्वारा दिये गये छाछ के लोभ से उसके संकेत
29पर नृत्य कर रहा है। इस प्रेम की बलिहारी है। जिसके नाम की
30यह महिमा है कि वह चारों प्रकार की मुक्तियाँ प्रदान कर देता है।
31वह स्वयं नेत्रों में जल भरकर यशोदा द्वारा ऊखल में बँधा खड़ा है।
32जिनके समक्ष ज्ञानियों एवं योगियों के समूह कृपा की याचना करते
33हैं, वे ही श्रीकृष्ण ब्रजांगनाओं से प्रेम की याचना करते हैं। श्री
34कृपालुजी कहते हैं- सम्पूर्ण ज्ञान-विज्ञान का सार यही है- कि
35प्रेम के द्वारा ही श्रीहरि को प्राप्त किया जा सकता है। जो भी कोई
36इस रहस्य को जानना चाहे वह जान सकता है। तुलसी दासजी ने
37रामचरितमानस में भी कहा—
38रामहिं केवल प्रेम पियारा, जानि लेहु जो जाननिहारा।