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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

तू ही गति तू ही मति तू ही रति राधे,

Reading 69 of 112 · Source no. 57 · Source PDF 124–125

1तू ही गति तू ही मति तू ही रति राधे,

2मो सो पतितन को न और ठौर राधे।

3माता पिता भ्राता सुत तिय पति राधे,

4बनते हितैषी पर स्वारथी हैँ राधे।

5स्वार्थ बिनु कोउ काउ देखे भी न राधे,

6बोलें सब मीठी बोल उर विष राधे।

7सुनते हैं सात स्वर्ग लोक सुख राधे,

8सोउ काल कर्म गुण आधीन राधे।

9उनते भी आगे विधि हरि हर राधे,

10वे भी तो हैं कृपा के भिखारी तेरे राधे।

11उनके भी ऊपर महाविष्णु राधे,

12वे भी महाविष्णु तेरी अंश कला राधे।

13श्रुति कह सबते परे हैं ब्रह्म राधे,

14जाको रूप निराकार साकार राधे।

15साकार ब्रह्म को तो जानो तुम राधे,

16तेरी चाकरी को तरसत नित राधे।

17उनते भी आगे तेरी ब्रज गोपी राधे,

18तुम दोनों की “कृपालु” कृपा एक राधे।

19भावार्थ—भक्त अपनी इष्टदेवी श्रीराधा से कहता है- हे श्रीराधे!

20तुम ही तो मेरी एकमात्र गति हो, तुम ही मेरी बुद्धि प्रदात्री हो एवं

21तुम ही मेरे प्रेम का आश्रय हो। राधे! मेरे जैसे पतित के लिये तुम्हें

22छोड़कर और दूसरा कोई स्थान नहीं है। यद्यपि संसार में माता,

23पिता, भाई, बन्धु, पुत्र एवं पति, पत्नी आदि के अनेक सम्बन्ध हैं।

24ये सब प्रकट में तो हितैषी प्रतीत होते हैं किन्तु सबके हृदय में

25स्वार्थ छिपा रहता है। बिना स्वार्थ के कोई किसी की ओर देखना

26भी पसन्द नहीं करता। शिष्टाचार-वश सभी अत्यन्त मधुर वाणी

27बोलते हैं परन्तु हृदय में सभी के विष घुला हुआ है। सुनने में आता

28है कि सात स्वर्ग लोक सुख से परिपूर्ण हैं। परन्तु वे लोक काल,

29कर्म एवं गुणों पर निर्भर हैं। अर्थात् स्वर्ग लोक का सुख क्षणिक

30है। शुभ-कर्मों से ही प्राप्त होता है तथा वहाँ भी माया के तीन

31गुण-सत्व, रज एवं तम विद्यमान हैं।स्वर्गहु स्वल्प अंत दुःखदायी।

32स्वर्ग लोक से ऊपर ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव के लोक हैं। वे भी

33तुम्हारी कृपा पर ही निर्भर हैं। इन सबसे श्रेष्ठ महाविष्णु हैं, वे

34महाविष्णु भी तुम्हारे अंश स्वरूप हैं। वेद के अनुसार सर्वोच्च पद

35ब्रह्म का है, जिसके निराकार एवं साकार दो रूप हैं-साकार ब्रह्म

36श्रीकृष्ण से तो तुम परिचित ही हो, वे तुम्हारी सेवा को सदा लालायित

37रहते हैं। उन साकार ब्रह्म से भी उच्च स्थान तुम्हारी ब्रज गोपियोँ

38का है। श्री कृपालुजी कहते हैं- ब्रजगोपियोँ की कृपा तुम्हारी ही

39कृपा है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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