Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
अपनी ओर लखु राधे, राधे राधे राधे।
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1अपनी ओर लखु राधे, राधे राधे राधे।
2हौं तो विमुख सदा ते राधे,
3जानूँ नहिं तोहिं राधे, राधे राधे राधे।
4तेरी माया ने मोहिं राधे,
5बहुत सताया राधे, राधे राधे राधे।
6लख चौरासी तनु धरि राधे,
7अति दुख पाया राधे, राधे राधे राधे।
8काऊ ने न बताया राधे,
9तेरी जीवन राधे, राधे राधे राधे।
10अगनित जनम पाप किये राधे,
11निशि दिन छिन छिन राधे, राधे राधे राधे।
12स्वर्गहु सुख भोगे सब राधे,
13सब झूठे सुख राधे, राधे राधे राधे।
14गुरु ने मरम बतायो राधे,
15तेरी स्वामिनि राधे, राधे राधे राधे।
16पै लखि पायो नहिं तोहिं राधे,
17भई निराशा राधे, राधे राधे राधे।
18तब गुरु ने समुझाया राधे,
19राधे नामहिं राधे, राधे राधे राधे।
20लै अवलंब नाम को राधे,
21अब भये निर्भय राधे, राधे राधे राधे।
22कबहूँ तो “कृपालु” छवि राधे,
23दिखरैहौ तुम राधे, राधे राधे राधे॥
24भावार्थ—भक्त प्रार्थना करते हुए कहता है-हे श्रीराधे! मेरी
25ओर न देखकर अपनी ओर ही देखो। मैं तो मायाधीन होने के
26कारण सदा से ही तुमसे विमुख हूँ। भला मैं तुम्हें जानने में समर्थ
27कैसे हो सकता हूँ? हे श्रीराधे! मैं तुम्हारी माया द्वारा बहुत पीड़ित
28किया गया हूँ। इसी माया के कारण मैंने चौरासी लाख शरीर धारण
29किये। मैंने अभी तक अत्यन्त दुःख ही दुःख पाये हैं। मुझे यह
30किसी ने नहीं बताया कि मुझे जीवन प्रदान करने वाली एकमात्र
31तुम्हीं हो। तुमसे विमुख होकर अनन्त जन्मों में मैंने निरन्तर पाप ही
32पाप किये। स्वर्ग के सुख भी मैंने भोगे हैं वे सब भी मिथ्या ही हैं।
33गुरु द्वारा मुझे यह ज्ञात हुआ कि तुम ही मेरी स्वामिनी हो। अभी
34तक मैंने कहीं तुम्हारी एक झलक भी नहीं पाई। अतः निराश हो
35गया। गुरु ने इस रहस्य का उद्घाटन किया कि श्रीराधा का नाम ही
36उनका निवासस्थान है। अब गुरु की कृपा से तुम्हारे नाम का आश्रय
37लेकर हम निर्भय हो गये हैं। हे “कृपालु” श्रीराधे! मुझे विश्वास है
38कि कभी तुम अपनी मनमोहिनी रूप सुधा का पान हमें भी
39कराओगी।