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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

अस कब ह्वैहौं राधे, राधे राधे राधे।

Reading 71 of 112 · Source no. 59 · Source PDF 127–129

1अस कब ह्वैहौं राधे, राधे राधे राधे।

2तुम्हरोइ ध्यान धरे उर राधे,

3गावुँ नित राधे राधे, राधे राधे राधे।

4गहवर मंजु कुंज बिच राधे,

5लतन लिपटि रोउँ राधे, राधे राधे राधे।

6जहँ तू रास करन चह राधे,

7देउँ बुहारी राधे, राधे राधे राधे।

8आयसु पावूँ जब तब राधे,

9बनूँ पहरुआ राधे, राधे राधे राधे।

10आवन देउँ न श्यामहुँ राधे,

11देखि मान तव राधे, राधे राधे राधे।

12सोवत जागत तव छवि राधे,

13भूलूँ नहिं पल राधे, राधे राधे राधे।

14सात्विक भाव आठहूँ राधे,

15प्रकट होँय तनु राधे, राधे राधे राधे।

16बनि जाय तोरिहिं इच्छा राधे,

17मोरिहुँ इच्छा राधे, राधे राधे राधे।

18पतितन प्यार करति तू राधे,

19परम पतित मैं राधे, राधे राधे राधे।

20अब “कृपालु” की सुधि लो राधे,

21करहु कृपा द्रुत राधे, राधे राधे राधे।

22भावार्थ—भक्त कहता है-हे श्रीराधे! मेरे जीवन में वे दिन

23कब आयेंगे जब मैं निरन्तर मन से तुम्हारी छवि का ध्यान करूँगा?

24मेरी वाणी अन्य मिथ्या वार्ताओं का त्यागकर कब केवल तुम्हारे

25नामों का ही गायन करेगी? हे श्री राधे! कब मुझ पर तुम्हारी इस

26प्रकार की कृपा होगी जब मैं गह्वरवन की सुन्दर कुंजों की लताओं

27का आलिंगन कर अश्रुपात करूँगा? जहाँ जहाँ तुम रास करने

28पधारोगी वहाँ पर सोहनी-सेवा करूँगा। जब कभी तुम आज्ञा प्रदान

29करोगी, कुंज भवन के द्वार पर पहरा दूँगी। हे मानिनी! जब तुम्हारी

30रुचि ऐसी पाऊँगी कि तुम प्रियतम से मान करो, तब मैं उन्हें, द्वार

31से प्रवेश भी नहीं करने दूँगी। जाग्रत, स्वप्न एवं सुषुप्ति में एक पल

32को भी तुम्हारी मनोहर मूर्ति मेरे हृदय से न्यारी न हो। जब तुम मुझे

33अपना प्रेम प्रदान कर दोगी तब मेरे शरीर में आठों सात्विक भाव

34(स्तम्भ, स्वेद, रोमांच आदि) उदय होने लगेंगे। हे राधे! मेरा ऐसा

35सौभाग्य कब होगा जब तुम्हारी इच्छा ही मेरी इच्छा बन जायगी।

36तुम तो पतितों पर ही कृपा करती हो, मैं तो अत्यन्त ही पतित हूँ।

37हे “कृपालु” अतः अब मेरी दशा पर भी ध्यान देकर शीघ्रातिशीघ्र

38कृपा-दृष्टि करो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version