Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
आजा प्यारी प्यारी प्यारी आजा, आजा आजा आजा।
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1आजा प्यारी प्यारी प्यारी आजा, आजा आजा आजा।
2उर में तो रह नित मन को भी भा जा,
3सन्मुख छवि दिखरा जा, आजा आजा आजा।
4जित देखुँ तू ही दीखे दृगन समा जा,
5तन मन प्रानन छा जा, आजा आजा आजा।
6काउ गोपी ते गोपी प्रेम दिला जा,
7ब्रज रस बूँद पिला जा, आजा आजा आजा।
8इक बार मेरी कहि मोहिं बुला जा,
9प्यारी मोहिं अपनी बना जा, आजा आजा आजा।
10अपनी बना के निज संग लिवा जा,
11मोहिं तजि प्यारी पुनि ना जा, आजा आजा आजा।
12काउ सों बताऊँ नहिं चोरी चोरी आजा,
13आके प्रीति रीति समुझा जा, आजा आजा आजा।
14तू ही मेरी गति यह उर में बिठा जा,
15उर बैठी माया को भगा जा, आजा आजा आजा।
16मेरे उर विरह की आग लगा जा,
17भाग “कृपालु” जगा जा, आजा आजा आजा॥
18भावार्थ—हे श्री राधे! मेरे नेत्रों के समक्ष प्रकट होकर मुझे
19अपना दिव्य-दर्शन प्रदान करो। प्रत्येक प्राणी के हृदय में तो
20तुम्हारा नित्य निवास है ही परन्तु बाहर प्रकट होकर भी मेरे नेत्रों
21को सफल कर दो। मेरे नेत्रों में तुम इस प्रकार से छा जाओ कि
22जिस दिशा में भी मेरी दृष्टि जाय, केवल तुम्हारा ही दर्शन करूँ।
23मेरे तन, मन एवं प्राणों में समा जाओ। किसी ब्रजगोपी द्वारा मुझे
24प्रेम प्रदान करा दो। ब्रज-रस की केवल एक बूँद ही मुझे पिला
25दो। राधे! केवल एक बार ही सही मुझे अपनी कहकर अपने
26निकट बुलाओ। हे प्यारी राधे! मुझे अपनी बना लो। एक बार
27मुझे अपनी बनाकर पुनः अपने साथ ही ले चलो। मुझे त्यागकर
28फिर कहीं न जाना। मैं तुम्हारी रहस्य लीला की चर्चा किसी अन्य
29से नहीं करूँगी। अतः एक बार आकर प्रेम-मार्ग का रहस्य
30समझा दो। तुम्हारे अतिरिक्त मेरे लिये कहीं अन्यत्र स्थान नहीं
31है; मेरे हृदय में यह विश्वास कब दृढ़ होगा? मेरे हृदय से माया
32को सदा के लिये दूर कर दो। हे “कृपालु” अपने विरह की ज्वाला
33मेरे हृदय में जला दो। मेरे सोये हुए भाग्य को जगा दो।