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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

जा जा जा वो ठगहार, तोहिं जानि गई ब्रजनार।

Reading 48 of 112 · Source no. 36 · Source PDF 84–85

1जा जा जा वो ठगहार, तोहिं जानि गई ब्रजनार।

2तू कपटिन को सरदार, भइ भूल बनायो यार॥

3त्रेता में लिय अवतार, बनि दशरथ राजकुमार।

4छुपि तरुवर बालिहिं मार, भइ भूल बनायो यार॥

5लिय पुनि वामन अवतार, गये भिक्षुक बनि बलि द्वार।

6लूट्यो बलि उर छल धार, भइ भूल बनायो यार॥

7सब सोइं कह करु मोहिं प्यार, पुनि कह कहु तू मोहिं यार।

8तू निलज निपट बट मार, भइ भूल बनायो यार॥

9काहुहिं तोरत गर हार, काहुहिं सिर चुनरि उतार।

10काहुहिं दृग बानन मार, भइ भूल बनायो यार॥

11भोरी भारी ब्रजनार, तू लंपट निपट गमार।

12तबहूँ “कृपालु” बलिहार, भइ भूल बनायो यार॥

13भावार्थ—किसी सखी ने श्यामसुंदर से कहा—अरे ठगों के

14सरदार! जाओ मेरे साथ बात न करना। तुमसे सारी गोपियाँ परिचित

15हैं। तुम तो कपटियों के शिरोमणि हो। मुझसे बहुत बड़ी गलती हो

16गई, जो मेरा प्रेम तुमसे जुड़ गया। जब त्रेता युग में अवतार लेकर

17तुम राजा दशरथ के पुत्र बने तब तुमने वृक्ष की ओट में छिपकर

18बाली का वध किया। पुनः जब तुमने वामन अवतार लिया तब तुम

19राजा बलि के द्वार पर वामन रूप धारण कर दान माँगने के लिये

20गये। तुमने अत्यन्त कपट पूर्वक उसका सर्वस्व हरण कर छलपूर्ण

21वचनों से उसे अपने धर्म से विचलित करना चाहा, उसने फिर भी

22अपना मस्तक तुम्हारे सामने झुका दिया किंतु तुमने इन्द्र को उसकी

23सम्पत्ति प्रदान कर उसे पाताल भेज दिया। मुझसे तो भूल हो चुकी

24जो तुमसे मैंने अपना सम्बन्ध जोड़ा। तुम प्रत्येक गोपी से ही कहते

25फिरते हो कि तू मुझसे प्रेम कर। उससे यह भी कहते हो कि तू

26अपने मुख से मुझे अपना प्रियतम कह। तुम तो अत्यन्त ही निर्लज्ज

27हो; मैंने व्यर्थ ही तुम्हें अपना प्रियतम बनाया। अरे ढीठ! तुम किसी

28के वक्ष पर पड़ा हार तोड़ डालते हो, किसी के सिर की ओढ़नी

29उतार देते हो। किसी को नेत्रों के बाणों से घायल करते हो।

30ब्रजगोपियाँ तो अत्यन्त ही भोली-भाली हैं, तुम अत्यन्त गँवार और

31लम्पट हो। श्री कृपालुजी कहते हैं- आश्चर्य तो यह है कि फिर

32भी ये अत्यन्त सरल गोपियाँ तुम पर बलिहार जाती हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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