Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
छेड़ो नहिं मोहिं छोड़ो मग मम नटखट।
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1छेड़ो नहिं मोहिं छोड़ो मग मम नटखट।
2मोहिं नहिं ऐसी वैसी जानो तुम नटखट॥
3अब लौं मिली हैं तोहिं भोरी भारी नटखट।
4मैं तो ललिता हूँ लाड़िली की सखि नटखट॥
5वा दिना की सुधि कहा भूलि गई नटखट।
6जा दिना थे मेरी हा हा खाये तुम नटखट॥
7पुनि करें मान जब मानिनि नटखट।
8पुनि मेरे पग परेगो निपट नटखट॥
9मेरी राधारानी के तो तेरे जैसे नटखट।
10महल बुहारी देने आवें नित नटखट॥
11लट्ठ गँवार ग्वार सँग रह नटखट।
12तू का जाने प्रीति रीति अटपट नटखट॥
13प्रीति रीति सीखु तब प्रीति चहु नटखट।
14बरबस प्रीति नहिं मिला करे नटखट॥
15प्रीति की जगद्गुरु लाड़िली नटखट।
16सेवा करि शिष्य बनि सीखु प्रीति नटखट॥
17यदि नहिं माने मनमानी करे नटखट।
18काउ दिन होय तेरो बुरो हाल नटखट॥
19ऊखल बधावूँ पिटवावूँ तोहिं नटखट।
20चेत जा अबहुँ तू “कृपालु” नट नटखट॥
21भावार्थ—श्रीराधा की परमांतरंग सखी ललिता ने चंचल कृष्ण
22से कहा- हे कृष्ण! मेरा मार्ग छोड़ दो। मुझे तुम्हारी चंचलता प्रिय
23नहीं है। मुझे कोई साधारण ब्रजांगना न समझना। अभी तक तो
24तुम्हें भोली-भाली ब्रजबालाएँ ही मिली हैं। मैं राधा की प्यारी सखी
25ललिता हूँ। अरे नटखट! उस दिन की बात तुम भूल गये जब मेरे
26पैरों पर गिरकर मुझसे क्षमा याचना कर रहे थे? अरे कृष्ण! मेरी
27सखी राधा के महल में तो तुम्हारे जैसे कितने ही झाड़ू लगाने आते
28हैं। तुम्हारा संग ग्रामीण ग्वालों का है। तुम प्रेम करना क्या जानो?
29क्या तुम्हारी जबरर्दस्ती से तुम्हें कोई प्रेम-दान देगी? प्रेम की आचार्या
30तो श्रीराधा ही हैं। उनकी सेवा कर उनके शिष्य बनकर ही तुम
31प्रीति की रीति सीख सकते हो। यदि मेरी बात न मानकर सबके
32साथ मनमानी करोगे तो तुम्हें पश्चाताप करना पड़ेगा। श्रीकृपालु
33जी के शब्दों में अब भी तुम सावधान हो जाओ, नहीं तो माता
34यशोदा से तुम्हारी शिकायत करूँगी। वे तुम्हें ऊखल से बाँधकर
35साँटी से पीटेंगी।