Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
तुझसा भगोड़ा नहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1तुझसा भगोड़ा नहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2प्रथम भज्यो निज धाम ते कान्हा,
3आया मम जग कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4किसी ने टिकाया नहिं निज घर कान्हा,
5आया बंदीगृह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6कंस भय बंदीगृहहुँ ते भागा कान्हा,
7आया गोकुल भजि कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8गोकुल ते असुरन भय कान्हा,
9आया भजि नँदगाँव कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10नँदगाँवहुँ भजि मधुपुरि कान्हा,
11तहँहुँ न रहि पाया कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12जरासन्ध भय भागा कान्हा,
13आया तू द्वारवती कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14द्वारिका ते भागा तू “कृपालु” जब कान्हा,
15गया पुनि निज धाम कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16भावार्थ—एक ब्रजगोपी श्रीकृष्ण से कहती है-अरे कृष्ण!
17तुम्हारे जैसा डरपोक और भागने वाला तो मैंने न कहीं देखा न
18सुना। पहले तो गोलोक धाम से भागकर तुम मृत्युलोक में आये।
19मृत्युलोक में तुम्हें कौन पूछता? अतः कंस के कारागार में तुम
20प्रकट हुए। कंस के भय से भयभीत हुए तुम वहाँ से भी भागकर
21गोकुल आ गये। गोकुल में कंस के भेजे हुए दैत्य आते ही रहते
22थे; अतः उनसे डरकर तुम नंदगाँव आ गये। नंदगाँव में भी तुम
23नहीं टिक सके तो मथुरा भाग आये। मथुरा में भी तुम स्थिर नहीं
24रहे। जरासंध के भय से भागकर द्वारिका पहुँचे। श्रीकृपालु जी
25कहते हैं- अन्त में द्वारिका से भी पुनः अपने निज धाम को पधार
26गये।