Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
तुम ही मम साहूकार, हम ऋणियाँ नंदकुमार।
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1तुम ही मम साहूकार, हम ऋणियाँ नंदकुमार।
2तुम्हरे अगनित उपकार, हम मानत तव आभार॥
3दिय मानव तनु सरकार, जेहि लहि पहुँचत तव द्वार।
4कह सुर दुर्लभ श्रुति चार, हम मानत तव आभार॥
5तव अनुकंपा सरकार, गुरु मिले किये उपकार।
6दीने मोहिं ज्ञान अपार, हम मानत तव आभार॥
7मम उर बस नंदकुमार, दे शक्ति मोहिं सरकार।
8दे फल कर्मन अनुसार, हम मानत तव आभार॥
9किय प्रकट वेद सरकार, जामें इक भक्ति तिहार।
10ढिग मोर “कृपालु” निहार, हम मानत तव आभार॥
11भावार्थ-हे श्रीकृष्ण! तुम मुझे ऋण देने वाले मेरे साहूकार हो
12तथा मैं सदैव तुम्हारा ऋणी ही रहूँगा। तुम्हारे असंख्य उपकारों से
13मैं दबा हुआ हूँ। मैं तुम्हारा आभारी हूँ। जिस शरीर से तुम्हारी
14प्राप्ति सुलभ है, वह देवदुर्लभ मानव-शरीर तुमने मुझे अपनी
15अकारण करुणा से ही प्रदान किया-
16कबहुँक करि करुणा नर देही। देत ईश बिनु हेतु सनेही।
17अतः मैं तो तुम्हारे आभार को स्वीकार करता हूँ। तुम्हारी
18अहैतुकी कृपा से ही मुझे गुरु प्राप्ति हुई, जिन्होंने मुझे अपार ज्ञान
19प्रदान किया। इसलिये भी मैं तुम्हारा आभारी हूँ। हे श्रीकृष्ण! मेरे
20हृदय में रहकर तुम मेरे इन्द्रिय, मन आदि को तत्कर्म करने की
21शक्ति प्रदान करते हो। हमारे पूर्वकाल के किये हुए कर्मों का फल
22भी हमें तुम ही प्रदान करते हो; अतः इस कारण से भी हम तुम्हारे
23आभारी हैं। तुमने प्रलय-काल में लुप्त हुए वेदों को जिनमें तुम्हारी
24भक्ति का निरूपण किया गया है, पुनः प्रकट किया; अतः मैं तुम्हारा
25आभारी हूँ। हे “कृपालु” अब तो मेरी ओर भी अपना कृपा-कटाक्ष
26करो।