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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

सुनु दाता नंदकुमार, हौं पतितन को सरदार।

Reading 33 of 112 · Source no. 21 · Source PDF 54–55

1सुनु दाता नंदकुमार, हौं पतितन को सरदार।

2तू पतितन सुनत पुकार, चह भीख प्रेम सरकार॥

3रिरियात परो तव द्वार, तू प्रेम रूप साकार।

4टुक हमरिहुँ ओर निहार, चह भीख प्रेम सरकार॥

5जग सुख नहिं चह रिझवार, चह मुक्ति न पाँच प्रकार।

6चह नहिं वैकुण्ठ बिहार, चह भीख प्रेम सरकार॥

7इक रही पूतना नार, विष प्यायो तोहिं उर धार।

8गति दीनी तुम बलिहार, चह भीख प्रेम सरकार॥

9हौं जानत तुम मम यार, परखत मोहिं भुजहिं पसार।

10तव अति “कृपालु” दरबार, चह भीख प्रेम सरकार॥

11भावार्थ—हे जगत् के एकमात्र दानी श्रीकृष्ण! मैं पतितों का

12सरताज हूँ। मैंने ऐसा सुना है कि तुम पतितों की पुकार सुनते हो।

13मुझे तुमसे केवल निष्काम प्रेम की ही भिक्षा चाहिये। हे नन्दनंदन!

14मैं तुम्हारे द्वार पर पड़ा हुआ गिड़गिड़ा रहा हूँ। तुम तो पवित्र प्रेम

15की जाग्रत प्रतिमा ही हो; अतः हमारे ऊपर भी अपनी किंचित्

16कृपा-दृष्टि कर दो। हमें तुम्हारे प्रेम की ही पिपासा है। हे रसिक

17शिरोमणि! हमें तुमसे संसार के सुख नहीं चाहिये। पाँचों प्रकार

18की मुक्तियों (सालोक्य, सामीप्य, सार्ष्टि, सारूप्य, एकत्व) की

19कामना भी मैं तुमसे नहीं करता। मुझे वैकुण्ठ-विलास की भी

20इच्छा नहीं है। मुझे तो दिव्य प्रेम की ही चाह है। राजा बलि की

21कन्या-रत्नावली ने जो कृष्णावतार में पूतना बनी, तुम्हें अपने अंक

22में धारण कर दुग्धपान कराने के बहाने से विष पिलाया, तुमने

23उसका स्तनपान कर उसे अपनी माता स्वीकार कर लिया।

24प्रसन्नतापूर्वक तुमने उस विष पिलाने वाली को भी अपना गोलोक

25प्रदान कर दिया। वस्तुतः तुम्हारे जैसा उदार दानी-शिरोमणि अन्य

26कौन होगा? मैं जानता हूँ कि तुम्हीं मेरे सच्चे सखा हो। तुम तो

27भुजाओं को पसार कर मुझे हृदय से लगा लेने को उत्सुक हो।

28तुम्हारे दरबार में तो नित्य कृपा की ही वर्षा हो रही है। अतः हे

29कृपालु! मुझे भी प्रेम-भिक्षा प्रदान करो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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