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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

रो रो के पुकारूँ तोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

Reading 32 of 112 · Source no. 20 · Source PDF 52–53

1रो रो के पुकारूँ तोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

2मेरो कोइ साधन बल नहिं कान्हा,

3तू ही मम बल कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

4तू तो अकिंचन का ही बस कान्हा,

5मैं भी तो अकिंचन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

6काहुहिं कर्मयोग बल कान्हा,

7विधि निषेध युत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

8काहुहिं कठिन योगबल कान्हा,

9अष्ट अंग युत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

10काहुहिं ज्ञान योग बल कान्हा,

11शम दमादि युत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

12काहुहिं भक्तियोग बल कान्हा,

13श्रुति विधान युत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

14हमरे तो बल बस इक कान्हा,

15नाम कीर्तन कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

16निज नामहिं रह तू नित कान्हा,

17उर प्रतीति यह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

18नाम अधीन रहत तू कान्हा,

19गुरु ने बताया कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।

20लो अपनाय कृपालुहिं कान्हा,

21तुम “कृपालु” अति कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥

22भावार्थ—हे श्रीकृष्ण! मैं तुम्हें नित्य ही रो रोकर बुला रहा

23हूँ। मुझे अपनी साधना का बल नहीं है। मेरे तो एकमात्र बल तुम

24ही हो। मैंने सुना है- तुम अकिंचनों के ही परम धन हो, मैं भी तो

25अकिंचन हूँ।

26नहिं विद्या नहिं बाहु बल, नहिं खर्चन को दाम।

27मो से पतित अपंग की, तुम पत राखो राम।

28हे श्रीकृष्ण! किसी साधक को तो वैदिक विधि-निषेध युक्त

29कर्मकाण्ड का आधार है, किसी को अष्टांग योग पर विश्वास है।

30कोई मनुष्य श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि से युक्त ज्ञानयोग के

31बल से बलवान है। कोई वैधी भक्ति द्वारा तुम्हें प्रसन्न करना चाहता

32है। हे श्यामसुन्दर! हमें तो एकमात्र तुम्हारे नाम संकीर्तन का ही

33बल है। हे कृष्ण! मुझे ऐसा दृढ़ विश्वास है कि तुम अपने नाम में

34सदा सर्वदा वर्तमान रहते हो। मेरे गुरु ने मुझे यह रहस्य बता दिया

35है कि तुम नाम के आधीन हो।ब्रह्म राम ते नाम बड़।हे कृपालु

36कृष्ण! मुझे भी अब अपना बना लो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version