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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

भले हैं बुरे हैं हैं तेरे, तेरे तेरे तेरे।

Reading 31 of 112 · Source no. 19 · Source PDF 50–52

1भले हैं बुरे हैं हैं तेरे, तेरे तेरे तेरे।

2वचन वेद में है यह तेरे,

3सबै जीव सुत तेरे, तेरे तेरे तेरे।

4श्रुति कह बिना अनुग्रह तेरे,

5जानि न सक सुत तेरे, तेरे तेरे तेरे।

6इक ते इक बढ़ि सुत सब तेरे,

7परम भक्त हैं तेरे, तेरे तेरे तेरे।

8जाने कोऊ जनाये तेरे,

9अहै हाथ सब तेरे, तेरे तेरे तेरे।

10ज्ञान दिये अब रसिकन तेरे

11एक श्याम हैं तेरे, तेरे तेरे तेरे।

12चरन शरन तब आये तेरे,

13सब तजि बनि गये तेरे, तेरे तेरे तेरे।

14नाम गुनन गावत अब तेरे,

15धरत ध्यान नित तेरे, तेरे तेरे तेरे।

16नामहिं रह तू कह जन तेरे,

17नाम बना दे तेरे, तेरे तेरे तेरे।

18कबहुँक बनि जैहैं हम तेरे

19यह आशा बल तेरे, तेरे तेरे तेरे।

20हैं “कृपालु” जो निज जन तेरे,

21सोइ प्रेम दे तेरे, तेरे तेरे तेरे॥

22भावार्थ—भक्त कहता है-हे श्रीकृष्ण! हम अच्छे या बुरे जैसे

23भी हैं हैं तो तुम्हारे ही। वेद में तुमने कहा है-अमृतस्य वै पुत्राः

24अर्थात् सभी जीव तुम्हारी सन्तान हैं। वेद यह भी कहता है कि

25तुम्हारी अनुकम्पा के बिना तुम्हारा अंश जीव तुम्हें जान नहीं सकता।

26मैं स्वीकार करता हूँ कि संसार में तुम्हारे जीव तुम्हारे प्रति भक्तिमान

27हैं। उन भक्तों में सभी एक दूसरे से बढ़कर हैं; किंतु इतना भी

28निश्चित है कि तुम्हारे जनाने से ही किसी ने तुम्हें जाना है।

29सोइ जानइ जेहि देहु जनाई।

30अतः किसी भी जीव को तुम जैसा चाहो बना सकते हो।

31तुम्हारे लिये क्या कठिन है। मुझे तो तुम्हारे प्रेमीजनों ने यही बताया

32है कि एक श्रीकृष्ण ही तुम्हारे हैं। मैंने उन रसिकजनों की बात

33मानकर, सबका आश्रय त्यागकर, अब तुम्हारे चरणों की शरण

34ग्रहण की है। अब तो हम निरन्तर तुम्हारा ही गुणगान करते हैं। मन

35से भी सतत् तुम्हारा ही ध्यान चिन्तन करते हैं। तुम्हारे भक्तों के

36कथनानुसार तुम्हारे नाम में ही तुम्हारा वास है। नाम लेकर जीव

37तुम्हारी कृपा को प्राप्त कर लेता है। (बाल्मीक इस तथ्य के प्रमाण

38स्वरूप हैं, ध्रुव, प्रह्लाद, मीरा ने भी तुम्हें नाम के द्वारा प्राप्त किया)

39ध्रुव सगलानि जपेउ हरि नामू, पायेउ अचल अनूपम ठामू।

40तुम्हारे नाम के बल पर हमें भी विश्वास है कि कभी हमें भी

41तुम्हारी कृपा प्राप्त होगी। हे कृपालु! तुम्हारे अपने प्रेमी-जन ही

42किसी को तुम्हारा प्रेम प्रदान कर सकते हैं।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version