Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
जाना नहिं कोउ तोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
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1जाना नहिं कोउ तोहिं कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
2श्रुति तव वचन सनातन कान्हा,
3नेति नेति कह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
4श्रुति कह अगनित गुनयुत कान्हा,
5कह निर्गुण हूँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
6श्रुति कह अगनित नामहिं कान्हा,
7पुनि अनाम कह कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
8श्रुति कह निराकार है कान्हा,
9कह साकारहुँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
10श्रुति कह निर्विशेष है कान्हा,
11कह सविशेषहुँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
12श्रुति कह जग भीतर रह कान्हा,
13कह जग बाहर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
14श्रुति कह जगत रूप है कान्हा,
15कह जग ते पर कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
16श्रुति कह जगत पिता हैं कान्हा,
17कह यशुमति सुत कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा।
18श्रुति कह अति “कृपालु” हैं कान्हा,
19कह समदर्शिहुँ कान्हा, कान्हा कान्हा कान्हा॥
20भावार्थ—हे श्रीकृष्ण! तुम्हें अपने बुद्धिबल से भला कौन
21जान सका है? वेद अनादि है, तुम्हारे श्रीमुख की ही वाणी है। वह
22वेद तुम्हारी महिमा का गान करते-करते अन्त में नेति नेति कहकर
23विश्राम प्राप्त कर लेता है। वेद की वाणी में विरोधाभास है। वह
24तुम्हें अनन्त दिव्य गुणों (प्रेम, कृपा, रूप) से परिपूर्ण कहकर
25पुनः निर्गुण (प्रकृति के गुणों से सर्वथा रहित) कहता है। वेद के
26अनुसार तुम अनन्त नामों से युक्त हो किन्तु पुनः वही वेद तुम्हें
27अनाम (नाम से रहित) कहता है। वेद तुम्हें निराकार एवं साकार
28दोनों ही प्रकार का बतलाता है। वेद के अनुसार तुम निर्विशेष एवं
29सविशेष दोनों ही हो। वेद तुम्हें विश्वरूप भी कहता है एवं विश्व
30से परे भी बताता है।
31वेद कहता है- तुम जगत् के भीतर बाहर सब जगह हो। एक
32स्थान पर वेद तुम्हें विश्वरूप घोषित करता है तथा दूसरे स्थान पर
33वही वेद चेतावनी देता है कि जगत् के प्रपंच का त्यागकर सम्पूर्ण
34भाव से ईश्वर के शरणापन्न हो जाना चाहिए। वेद तुम्हें जगत् का
35पिता कहता है। समय के अनुसार तुम यशोदा के पुत्र भी बन जाते
36हो। पुनः वेद ईश्वर को समदर्शी एवं न्यायी कहता है परन्तु भक्तों
37के प्रेम के वशीभूत हो तुम उनके प्रति अत्यन्त कृपालु बन जाते हो।