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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

आजा मेरे प्रानन प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे।

Reading 29 of 112 · Source no. 17 · Source PDF 47–48

1आजा मेरे प्रानन प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे।

2मम कछु साधन बल नहिं प्यारे,

3दीन हीन हौं प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे।

4तू कह निर्मल मन मोहिं प्यारे,

5कृपा पात्र बन प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे।

6को भयो विमल कृपा बिनु प्यारे,

7नाम बता दे प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे।

8मन में तो माया तेरी प्यारे,

9को जीता तेहिं प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे।

10मन ते तो हारे ज्ञानिहुँ प्यारे,

11भरत बने मृग प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे।

12तू तो कर प्यार पतित सों प्यारे,

13अस कह रसिकन प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे।

14परम पतित “कृपालु” हौं प्यारे,

15पावन करु द्रुत प्यारे, प्यारे प्यारे प्यारे॥

16भावार्थ—हे प्राणप्रियतम कृष्ण! हमारे नेत्रों के समक्ष आकर

17एक बार तो अपनी झलक दिखा दो। हे नाथ। मेरे पास तुम्हें

18रिझाने के लिये कोई भी गुण, विद्या अथवा धन आदि का साधन

19नहीं है। तपश्चर्या, ज्ञान आदि साधन बल से भी रहित हूँ। मैं तो

20अत्यन्त ही दीन हीन हूँ। तुम्हें तो शुद्ध हृदय वाली आत्मा ही प्रिय

21है। शुद्ध अन्तः करण ही तुम्हारी कृपा का पात्र बन सकता है। हे

22श्यामसुन्दर! मैं तुमसे यह प्रश्न पूछता हूँ कि तुम्हारी कृपा के बिना

23क्या कोई पापात्मा कभी पवित्र बन सकी है? यदि ऐसा है तो एक

24का भी नाम बता दो। मन माया के आधीन है, अतः इस मन को

25जीतना तो अत्यन्त ही कठिन है। बड़े-बड़े ज्ञानी एवं योगी भी इस

26माया के समक्ष पराजित हो गये। राजर्षि भरत ने राज्य त्यागकर

27वन में साधना की परन्तु अन्तिम समय में मृग-शावक का चिन्तन

28हो जाने से उन्हें मृग का शरीर धारण करने को विवश होना पड़़ा।

29तुम्हारे सन्त तो कहते हैं कि तुम्हारा सहज स्नेह पतितों को ही

30प्राप्त होता है। हे कृपालु! मैं तो अत्यन्त ही पतित हूँ; अतः मुझे

31पावन बनाने में आनाकानी न करो। शीघ्रता करो।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

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