Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
तू ही मेरा इक श्याम, मैं भी इक तेरा श्याम,
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1तू ही मेरा इक श्याम, मैं भी इक तेरा श्याम,
2तेरे अगनित जन श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
3तू ही मम माता श्याम, है पिता एक तू श्याम,
4हौं तो हूँ तव सुत श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
5तू ही मम अंशी श्याम, तव अंश जीव मैं श्याम,
6तू विभु मैं अणु हूँ श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
7तू ही मम प्रेरक श्याम, तव प्रेर्य जीव मैं श्याम,
8तू चेतन चेतन श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
9तू ही मम शासक श्याम, तव शास्य जीव मैं श्याम,
10तू ही मम आश्रय श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
11तू सर्वशक्ति युत श्याम, मैं अल्पशक्ति युत श्याम,
12मैं अज्ञ विज्ञ तू श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
13तू ही मम स्वामी श्याम, तव दास जीव मैं श्याम,
14तू ही मम देही श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
15तू ही मम दाता श्याम, मैं तो तव भिक्षुक श्याम,
16तू ही गति मति रति श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
17तू है मायापति श्याम, माया अधीन मैं श्याम,
18तेरे सम तू ही श्याम, जय जयति जयति जय श्याम।
19तू दीनबंधु है श्याम, मैं दीन हीन हूँ श्याम,
20तू कृपा सिंधु है श्याम, चह कृपा “कृपालुहुँ” श्याम।
21भावार्थ—हे श्यामसुन्दर! मेरे तो एकमात्र तुम ही हो। तुम्हारे
22अगणित भक्त हैं उनमें से एक मुझे भी समझ लेना। तुम्हारी सदा
23ही जय हो। हे श्यामसुन्दर! मेरी माता एवं पिता एकमात्र तुम ही
24हो। मैं तुम्हारा पुत्र हूँ। हे नाथ! तुम्हारी सदा ही जय हो। श्यामसुंदर!
25तुम मेरे अंशी हो, मैं तुम्हारा अंश जीव हूँ। हे प्रभु! तुम व्यापक
26हो, मैं अणु स्वरूप हूँ। तुम मेरे मन, बुद्धि आदि को प्रेरणा देने
27वाले प्रेरक हो, मैं तुम्हारे द्वारा प्रेरित होकर चेष्टा करता हूँ। तुम तो
28चेतनश्चेतनानाम्चेतनों के भी चेतन हो। तुम्हारी सदा ही विजय
29हो। तुम मेरे शासक हो। मैं तुम्हारे द्वारा शासित हूँ। मेरे एकमात्र
30अवलम्ब तुम ही हो। तुम्हारी सदा ही जय हो।
31तुम सर्व-शक्ति-सम्पन्न हो मैं अल्प शक्तिमान हूँ। मैं तो अत्यन्त
32अज्ञानी हूँ, तुम ज्ञान से परिपूर्ण ईश्वर हो। तुम मेरे स्वामी हो, मैं
33तुम्हारा दास हूँ। तुम मुझ आत्मा के निवास स्थान हो। तुम प्रेम-भिक्षा
34देने वाले अद्वितीय दाता हो, मैं तुम्हारे द्वार का भिक्षुक। हे
35श्यामसुन्दर! मेरी गति, मति, रति सब कुछ तुम ही हो। तुम तो माया
36के स्वामी हो, मैं माया के अधीन एक साधारण जीव। तुम्हारे समान
37तो एक तुम ही हो।
38निरुपम न उपमा आन तुम्हारे जैसा दीनवत्सल अन्य कोई
39....
40नहीं दिखाई देता। हे कृपा के समुद्र! मैं तुम्हारी कृपा की याचना
41करता हूँ।