Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj
सुनु सुनु ओ नंदकुमार,तव माया शक्ति अपार।
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1सुनु सुनु ओ नंदकुमार,तव माया शक्ति अपार।
2विधि हरि हर हूँ गये हार, हौं शरण शरण सरकार॥
3कह नेति नेति श्रुति चार, ज्ञानिहुँ नहिं पायो पार।
4तव लीला अपरंपार, हौं शरण शरण सरकार॥
5तू दीनन को रखवार, अस कह सब संत पुकार।
6तू अधम उधारन हार, हौं शरण शरण सरकार॥
7तू निर्बल बल रिझवार, तू निराधार आधार।
8तू कृपा रूप साकार, हौं शरण शरण सरकार॥
9तव नामहिं मम आधार, तू रह नामहिं रिझवार।
10दे दे “कृपालु” कहँ प्यार, हौं शरण शरण सरकार॥
11अर्थ—हे नंदनंदन! कुछ मेरी भी पुकार सुनो! तुम्हारी अपार
12माया शक्ति से तो सृष्टिकर्ता ब्रह्मा, विष्णु एवं शिव भी पराजित हो
13गये।
14शिव विरंचि कहँ मोहइ, को है बपुरा आन।
15मैं क्षुद्र जीव भला उसका सामना किस प्रकार कर सकता हूँ?
16अतः हे मायापति! उससे भयभीत होकर मैंने तुम्हारी शरण ग्रहण
17की है। चारों वेद तुम्हारी लीला का वर्णन करते हुए अन्त में “न इति”
18“न इति” ही कहते हैं। जब बड़े-बड़े ज्ञानी भी तुम्हारी लीला के
19अभिप्राय को समझने में असमर्थ ही रहते हैं तब मेरे जैसा एक
20साधारण जीव तुम्हारी लीलाओं के रहस्य को कैसे जान सकता है?
21सभी सन्त पुकार-पुकार कर कह रहे हैं- तुम दीनों की रक्षा करते
22हो। तुम्हें अधमों का उद्धारकर्ता जानकर ही मैं तुम्हारे शरणापन्न हुआ
23हूँ। हे रसिकशेखर! निर्बलों के एकमात्र बल तुम्हीं हो। निराधारों का
24आधार तुम्हारे अतिरिक्त दूसरा कौन है? हे गोविंद! तुम्हें कृपा की
25साकार प्रतिमा जानकर ही मैंने तुम्हारी शरण ग्रहण की है। हे नाथ!
26तुम अपने नाम में नित्य निवास करते हो; अतः मैंने आपके पुनीत
27नाम का आश्रय लिया है। कृपालुजी कहते हैं- हे मेरे सर्वश्रेष्ठ स्वामी!
28मैं तुम्हारी शरण हूँ। मुझे अपना निष्काम प्रेम प्रदान करो।