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Yugal Shatak

Jagadguru Shri Kripalu Ji Maharaj

प्रान प्रान मम कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

Reading 24 of 112 · Source no. 12 · Source PDF 38–40

1प्रान प्रान मम कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

2सब देहन देही करि माना,

3प्रान श्रुतिन तव कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

4प्रानन प्रान श्रुतिन पुनि माना,

5वेद वेद्य तोहिं कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

6तनु जिमि प्रान दास जग जाना,

7प्रान दास तिमि कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

8निज दासत्व भुलायेहु प्राना,

9पायेहु दुख जग कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

10गुरु ने ज्ञान दिया तब जाना,

11मेरो स्वामी कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

12जग सुख विष्ठा सम अब माना,

13शरण गही तव कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

14हौं अस पतित पतित नहिं माना,

15आपुन कहँ हौं कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

16जग सुख सब मिथ्या बुधि जाना,

17तदपि न माना कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

18तत्वसार अब हौं यह जाना,

19कृपा याचना कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा।

20अब तो है “कृपालु” तोहिं पाना,

21जैसे भी हो कान्हा, कान्हा मेरो कान्हा॥

22भावार्थ—हे मेरे प्राणों के प्राण कृष्ण! वेद ऐसा कहता है कि

23सब शरीरों में प्राण ही प्रमुख है। वेदों द्वारा जानने योग्य तुम उन

24प्राणों के भी प्राण हो। संसार में ऐसा देखा जाता है कि शरीर का

25स्वामी प्राण है शरीर प्राणों का दास है, उसी प्रकार प्राण भी तुम्हारा

26दासत्व करता है। तुम्हारी शक्ति के बिना प्राण भी स्वतन्त्र रूप से

27कोई चेष्टा करने में असमर्थ है। प्राणों ने जब से अपने धर्म (तुम्हारी

28सेवा) को भुलाया, तभी से प्राणी संसार में नाना प्रकार के कष्ट पा

29रहे हैं। गुरु द्वारा प्रदत्त ज्ञान से जब जीव यह जान लेता है कि

30उसके स्वामी एकमात्र तुम ही हो तब उसे सांसारिक सुख (धन,

31मान आदि) विष्ठा के समान ही प्रतीत होने लगते हैं। संसार से

32वैराग्य होने पर ही तुम्हारी शरण में जीव आता है। हे मेरे परम

33पावन प्रभु! मैं तो स्वयं को पतित भी स्वीकार नहीं करता ऐसा

34विचित्र पतित हूँ। हे श्यामसुन्दर! मेरी बुद्धि संसार के सुखों को

35असत्य समझती है किन्तु मेरी विवशता तो यही है कि मैं अपने मन

36के वशीभूत होकर संसार में पुनः आसक्त हो जाता हूँ। मेरा वैराग्य

37श्मशान वैराग्य है। सत्संग द्वारा मैंने यही सार निकाला कि तुम्हारे

38समक्ष दीन बनकर मैं तुमसे तुम्हारी कृपा की याचना करूँ। कभी

39तो तुम अपनी कृपा दृष्टि का अधिकारी मुझे बना ही लोगे। कृपालुजी

40कहते हैं- हे मेरे जीवन! मेरे सर्वस्व! जिस किसी भी प्रकार से

41प्राणों की बाजी लगाकर भी अब तो तुम्हें प्राप्त करने का दृढ़

42संकल्प कर लिया है।

Native Hindi songs and published Hindi explanations from the supplied 2005 edition. The older image-only Yugal Shatak scan remains a separate source. Supplied edition: Third edition, Sharad Purnima, 17 October 2005. Published explanation: सुश्री ब्रजकुंजरी देवी.

Source edition and PDF · Text version